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Yajurveda - Mantra 41

Yajurveda Adhyay 18 / Mantra 41

77 Mantra
18/41
Devata- वातो देवता Rishi- देवा ऋषयः Chhand- ब्राह्म्युष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
इ॒षि॒रो वि॒श्वव्य॑चा॒ वातो॑ गन्ध॒र्वस्तस्यापो॑ऽअप्स॒रस॒ऽऊर्जो॒ नाम॑। स न॑ऽइ॒दं ब्रह्म॑ क्ष॒त्रं पा॑तु॒ तस्मै॒ स्वाहा॒ वाट् ताभ्यः॒ स्वाहा॑॥४१॥

इ॒षि॒रः। वि॒श्वव्य॑चाः। वातः॑। ग॒न्ध॒र्वः। तस्य॑। आपः॑। अ॒प्स॒रसः॑। ऊर्जः॑। नाम॑। सः। नः॒। इ॒दम्। ब्रह्म॑। क्ष॒त्रम्। पा॒तु॒। तस्मै॑। स्वाहा॑। वाट्। ताभ्यः॑। स्वाहा॑ ॥४१ ॥

Mantra without Swara
इषिरो विश्वव्यचा वातो गन्धर्वस्तस्यपोऽअप्सरसऽऊर्जा नाम । स नऽइदम्ब्रह्म क्षत्रम्पातु तस्मै स्वाहा वाट्ताभ्यः स्वाहा ॥

इषिरः। विश्वव्यचाः। वातः। गन्धर्वः। तस्य। आपः। अप्सरसः। ऊर्जः। नाम। सः। नः। इदम्। ब्रह्म। क्षत्रम्। पातु। तस्मै। स्वाहा। वाट्। ताभ्यः। स्वाहा॥४१॥

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Meaning
हे मनुष्यो! जो (इषिरः) जिससे इच्छा करते वा (विश्वव्यचाः) जिसकी सब संसार में व्याप्ति है, वह (गन्धर्वः) पृथिवी और किरणों को धारण करता (वातः) सब जगह भ्रमण करने वाला पवन है (तस्य) उसके जो (आपः) जल और प्राण, अपान, उदान, समान, व्यान आदि भाग हैं, वे (अप्सरसः) अन्तरिक्ष जल में जाने-आने और (ऊर्जः) बल-पराक्रम के देने वाले (नाम) प्रसिद्ध हैं, जैसे (सः) वह (नः) हम लोगों के लिये (इदम्) इस (ब्रह्म) सत्य के उपदेश से सब की वृद्धि करने वाले ब्राह्मणकुल तथा (क्षत्रम्) विद्या के बढ़ाने वाले राजकुल की (पातु) रक्षा करे, वैसे तुम लोग भी आचरण करो और (तस्मै) उक्त पवन के लिये (स्वाहा) उत्तम क्रिया की (वाट्) प्राप्ति तथा (ताभ्यः) उन जल आदि के लिये (स्वाहा) उत्तम क्रिया वा उत्तम वाणी को युक्त करो॥४१॥
Essence
शरीर में जितनी चेष्टा और बल-पराक्रम उत्पन्न होते हैं, वे सब पवन से होते हैं और पवन ही प्राणरूप और जल गन्धर्व अर्थात् सबको धारण करने वाले हैं, यह मनुष्यों को जानना चाहिये॥४१॥
Subject
फिर मनुष्यों को पवन आदि से उपकार लेने चाहियें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥