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Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 96

99 Mantra
17/96
Devata- यज्ञपुरुषो देवता Rishi- वामदेव ऋषिः Chhand- निचृदार्षी त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अ॒भिप्र॑वन्त॒ सम॑नेव॒ योषाः॑ कल्या॒ण्यः] स्मय॑मानासोऽअ॒ग्निम्। घृ॒तस्य॒ धाराः॑ स॒मिधो॑ नसन्त॒ ता जु॑षा॒णो ह॑र्यति जा॒तवे॑दाः॥९६॥

अ॒भि। प्र॒व॒न्त॒। सम॑ने॒वेति॒ सम॑नाऽइव। योषाः॑। क॒ल्या॒ण्यः᳕। स्मय॑मानासः। अ॒ग्निम्। घृ॒तस्य॑। धाराः॑। स॒मिध॒ इति॑ स॒म्ऽइधः॑। न॒स॒न्त॒। ताः। जु॒षा॒णः। ह॒र्यति॒। जा॒तवे॑दाः ॥९६ ॥

Mantra without Swara
अभि प्रवन्त समनेव योषाः कल्याण्यः स्मयमानासोऽअग्निम् । घृतस्य धाराः समिधो नसन्त ता जुषाणो हर्यति जातवेदाः ॥

अभि। प्रवन्त। समनेवेति समनाऽइव। योषाः। कल्याण्यः। स्मयमानासः। अग्निम्। घृतस्य। धाराः। समिध इति सम्ऽइधः। नसन्त। ताः। जुषाणः। हर्यति। जातवेदाः॥९६॥

Meaning
(स्मयमानासः) किञ्चित् हंसने से प्रसन्नता करने (कल्याण्यः) कल्याण के लिये आचरण करने तथा (समनेव, योषा) एक से चित्त वाली स्त्रियां जैसे पतियों को प्राप्त हों, वैसे जो (समिधः) शब्द-अर्थ और सम्बन्धों से सम्यक् प्रकाशित (घृतस्य) शुद्ध ज्ञान की (धाराः) वाणी (अग्निम्) तेजस्वी विद्वान् को (अभि, प्रवन्त) सब ओर से पहुँचती और (नसन्त) प्राप्त होती हैं, (ताः) उन वाणियों का (जुषाणः) सेवन करता हुआ (जातवेदाः) ज्ञानी विद्वान् (हर्यति) कान्ति को प्राप्त होता है॥९६॥
Essence
इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। जैसे प्रसन्नचित्त आनन्द को प्राप्त सौभाग्यवती स्त्रियां अपने-अपने पतियों को प्राप्त होती हैं, वैसे ही विद्या तथा विज्ञानरूप आभूषण से शोभित वाणी विद्वान् पुरुष को प्राप्त होती है॥९६॥
Subject
फिर वही विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

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