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Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 57

99 Mantra
17/57
Devata- यज्ञो देवता Rishi- अप्रतिरथ ऋषिः Chhand- निचृदार्षी बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
वी॒तꣳ ह॒विः श॑मि॒तꣳ श॑मि॒ता य॒जध्यै॑ तु॒रीयो॑ य॒ज्ञो यत्र॑ ह॒व्यमेति॑। ततो॑ वा॒काऽआ॒शिषो॑ नो जुषन्ताम्॥५७॥

वी॒तम्। ह॒विः। श॒मि॒तम्। श॒मि॒ता। य॒जध्यै॑। तु॒रीयः॑। य॒ज्ञः। यत्र॑। ह॒व्यम्। एति॑। ततः॑। वा॒काः। आ॒शिष॒ इत्या॒ऽऽशिषः॑। नः॒। जु॒ष॒न्ता॒म् ॥५७ ॥

Mantra without Swara
वीतँ हविः शमितँ शमिता यजध्यै तुरीयो यज्ञो यत्र हव्यमेति । ततो वाका आशिषो नो जुषन्ताम् ॥

वीतम्। हविः। शमितम्। शमिता। यजध्यै। तुरीयः। यज्ञः। यत्र। हव्यम्। एति। ततः। वाकाः। आशिष इत्याऽऽशिषः। नः। जुषन्ताम्॥५७॥

Meaning
हे मनुष्यो! जो (शमिता) शान्ति आदि गुणों से युक्त गृहाश्रमी (यजध्यै) यज्ञ करने के लिये (वीतम्) गमनशील (शमितम्) दुर्गुणों की शान्ति करने वाले (हविः) होम करने योग्य पदार्थ को अग्नि में छोड़ता है जो (तुरीयः) चौथा (यज्ञः) प्राप्त करने योग्य यज्ञ है तथा (यत्र) जहां (हव्यम्) होम करने योग्य पदार्थ (एति) प्राप्त होता है (ततः) उन सबों से (वाकाः) जो कही जाती हैं, वे (आशिषः) इच्छासिद्धि (नः) हम लोगों को (जुषन्ताम्) सेवन करें, ऐसी इच्छा करो॥५७॥
Essence
अग्निहोत्र आदि यज्ञ में चार पदार्थ होते हैं अर्थात् बहुत-सा पुष्टि, सुगन्धि, मिष्ट और रोग विनाश करने वाला होम का पदार्थ, उसका शोधन, यज्ञ का करने वाला तथा वेदी, आग, लकड़ी आदि। यथाविधि से हवन किया हुआ पदार्थ आकाश को जाकर फिर वहां से पवन वा जल के द्वारा आकर इच्छा की सिद्धि करने वाला होता है, ऐसा मनुष्य को जानना चाहिये॥५७॥
Subject
फिर भी उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

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