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Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 5

99 Mantra
17/5
Devata- अग्निर्देवता Rishi- मेधातिथिर्ऋषिः Chhand- भुरिगार्षी गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
हि॒मस्य॑ त्वा ज॒रायु॒णाग्ने॒ परि॑व्ययामसि। पा॒व॒कोऽअ॒स्मभ्य॑ꣳ शि॒वो भ॑व॥५॥

हि॒मस्य॑। त्वा॒। ज॒रायु॑णा। अग्ने॑। परि॑। व्य॒या॒म॒सि॒। पा॒व॒कः। अ॒स्मभ्य॑म्। शि॒वः। भ॒व॒ ॥५ ॥

Mantra without Swara
हिमस्य त्वा जरायुणाग्ने परिव्ययामसि । पावकोऽअस्मभ्यँ शिवो भव ॥

हिमस्य। त्वा। जरायुणा। अग्ने। परि। व्ययामसि। पावकः। अस्मभ्यम्। शिवः। भव॥५॥

Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के तुल्य तेजस्विन् सभापते! हम लोग (हिमस्य) शीतल को (जरायुणा) जीर्ण करने वाले वस्त्र वा अग्नि से (त्वा) आपको (परि, व्ययामसि) सब प्रकार आच्छादित करते हैं, वैसे (पावकः) पवित्रस्वरूप आप (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (शिवः) मङ्गलमय (भव) हूजिये॥५॥
Essence
हे सभापते! जैसे अग्नि वा वस्त्र शीत से पीडि़त प्राणियों को जाड़े से छुड़ा के प्रसन्न करता है, वैसे ही आप का आश्रय किये हुए हम लोग दुःख से छूटे हुए सुख सेवने वाले होवें॥५॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥

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