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Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 15

99 Mantra
17/15
Devata- अग्निर्देवता Rishi- लोपामुद्रा ऋषिः Chhand- विराडार्षी पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
प्रा॒ण॒दाऽअ॑पान॒दा व्या॑न॒दा व॑र्चो॒दा व॑रिवो॒दाः। अन्याँ॒स्ते॑ऽअ॒स्मत्त॑पन्तु हे॒तयः॑ पाव॒कोऽअ॒स्मभ्य॑ꣳ शि॒वो भ॑व॥१५॥

प्रा॒ण॒दा इति॑ प्राण॒ऽदाः। अ॒पा॒न॒दा इत्य॑पान॒ऽदाः। व्या॒न॒दा इति॑ व्यान॒ऽदाः। व॒र्चो॒दा इति॑ वर्चः॒ऽदाः। व॒रि॒वो॒दा इति॑ वरिवः॒ऽदाः। अ॒न्यान्। ते॒। अ॒स्मत्। त॒प॒न्तु॒। हे॒तयः॑। पा॒व॒कः। अ॒स्मभ्य॑म्। शि॒वः। भ॒व॒ ॥१५ ॥

Mantra without Swara
प्राणदाऽअपानदा व्यानदा वर्चादा वरिवोदाः । अन्याँस्तेऽअस्मत्तपन्तु हेतयः पावकोऽअस्मभ्यँ शिवो भव ॥

प्राणदा इति प्राणऽदाः। अपानदा इत्यपानऽदाः। व्यानदा इति व्यानऽदाः। वर्चोदा इति वर्चःऽदाः। वरिवोदा इति वरिवःऽदाः। अन्यान्। ते। अस्मत्। तपन्तु। हेतयः। पावकः। अस्मभ्यम्। शिवः। भव॥१५॥

Meaning
हे विद्वन् राजन्! (ते) आपकी जो उन्नति वा शस्त्रादि (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (प्राणदाः) जीवन तथा बल को देने वा (अपानदाः) दुःख दूर करने के साधन को देने वा (व्यानदाः) व्याप्ति और विज्ञान को देने (वर्चोदाः) सब विद्याओं के पढ़ने का हेतु को देने और (वरिवोदाः) सत्य धर्म्म और विद्वानों की सेवा को व्याप्त कराने वाली (हेतयः) वज्रादि शस्त्रों की उन्नतियां (अस्मत्) हमसे (अन्यान्) अन्य दुष्ट शत्रुओं को (तपन्तु) दुःखी करें, उनके सहित (पावकः) शुद्धि का प्रचार करते हुए आप हम लोगों के लिये (शिवः) मङ्गलकारी (भव) हूजिये॥१५॥
Essence
वही राजा है जो न्याय को बढ़ाने वाला हो, और वही विद्वान् है जो विद्या से न्याय को जानने वाला हो, और वह राजा नहीं जो कि प्रजा को पीड़ा दे, और वह विद्वान् भी नहीं जो दूसरों को विद्वान् न करे, और वे प्रजाजन भी नहीं जो नीतियुक्त राजा की सेवा न करें॥१५॥
Subject
विद्वान् और राजा कैसे हों, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

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