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Yajurveda Adhyay 17 / Mantra 11

99 Mantra
17/11
Devata- अग्निर्देवता Rishi- लोपामुद्रा ऋषिः Chhand- भुरिगार्षी बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
नम॑स्ते॒ हर॑से शो॒चिषे॒ नम॑स्तेऽअस्त्व॒र्चिषे॑। अ॒न्याँस्ते॑ अ॒स्मत्त॑पन्तु हे॒तयः॑ पाव॒कोऽअ॒स्मभ्य॑ꣳ शि॒वो भ॑व॥११॥

नमः॑। ते॒। हर॑से। शो॒चिषे॑। नमः॑। ते॒। अ॒स्तु॒। अ॒र्चिषे॑। अ॒न्यान्। ते॒। अ॒स्मत्। त॒प॒न्तु॒। हे॒तयः॑। पा॒व॒कः। अ॒स्मभ्य॑म्। शि॒वः। भ॒व॒ ॥११ ॥

Mantra without Swara
नमस्ते हरसे शोचिषे नमस्तेऽअस्त्वर्चिषे । अन्याँस्तेऽअस्मत्तपन्तु हेतयः पावकोऽअस्मभ्यँ शिवो भव ॥

नमः। ते। हरसे। शोचिषे। नमः। ते। अस्तु। अर्चिषे। अन्यान्। ते। अस्मत्। तपन्तु। हेतयः। पावकः। अस्मभ्यम्। शिवः। भव॥११॥

Meaning
हे सभापते! (हरसे) दुःख हरने वाले (ते) तेरे लिये हमारा किया (नमः) सत्कार हो तथा (शोचिषे) पवित्र (अर्चिषे) सत्कार के योग्य (ते) तेरे लिये हमारा कहा (नमः) नमस्कार (अस्तु) हो जो (ते) तेरी (हेतयः) वज्रादि शस्त्रों से युक्त सेना हैं वे (अस्मत्) हम लोगों से भिन्न (अन्यान्) अन्य शत्रुओं को (तपन्तु) दुःखी करें (पावकः) शुद्धि करनेहारे आप (अस्मभ्यम्) हमारे लिये (शिवः) न्यायकारी (भव) हूजिये॥११॥
Essence
मनुष्यों को चाहिये कि अन्तःकरण के शुद्ध मनुष्यों को न्यायधीश बनाकर और दुष्टों की निवृत्ति करके सत्य न्याय का प्रकाश करें॥११॥
Subject
न्यायाधीश को कैसा होना चाहिये, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

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