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Yajurveda Adhyay 15 / Mantra 59

65 Mantra
15/59
Devata- इन्द्राग्नी देवते Rishi- परमेष्ठी ऋषिः Chhand- विराडनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
लो॒कं पृ॑ण छि॒द्रं पृ॒णाथो॑ सीद ध्रु॒वा त्वम्। इ॒न्द्रा॒ग्नी त्वा॒ बृह॒स्पति॑र॒स्मिन् योना॑वसीषदन्॥५९॥

लो॒कम्। पृ॒ण॒। छि॒द्रम्। पृ॒ण॒। अथो॒ इत्यथो॑। सी॒द॒। ध्रु॒वा। त्वम्। इ॒न्द्रा॒ग्नी इती॑न्द्रा॒ग्नी। त्वा॒। बृह॒स्पतिः॑। अ॒स्मिन्। योनौ॑। अ॒सी॒ष॒द॒न्। अ॒सी॒स॒द॒न्नित्य॑सीसदन् ॥५९ ॥

Mantra without Swara
लोकम्पृण छिद्रम्पृणाथो सीद धु्रवा त्वम् । इन्द्राग्नी त्वा बृहस्पतिरस्मिन्योनावसीषदन् ॥

लोकम्। पृण। छिद्रम्। पृण। अथो इत्यथो। सीद। ध्रुवा। त्वम्। इन्द्राग्नी इतीन्द्राग्नी। त्वा। बृहस्पतिः। अस्मिन्। योनौ। असीषदन्। असीसदन्नित्यसीसदन्॥५९॥

Meaning
हे स्त्रि! (त्वम्) तू इस (लोकम्) लोक तथा परलोक को (पृण) सुखयुक्त कर, (छिद्रम्) अपनी न्यूनता को (पृण) पूरी कर और (ध्रुवा) निश्चलता से (सीद) घर में बैठ (अथो) इसके अनन्तर (इन्द्राग्नी) उत्तम धनी ज्ञानी तथा (बृहस्पतिः) अध्यापक (अस्मिन्) इस (योनौ) गृहाश्रम में (त्वा) तुझ को (असीषदन्) स्थापित करें॥५९॥
Essence
अच्छी चतुर स्त्री को चाहिये कि घर के कार्यों के साधनों को पूरे करके सब कार्यों को सिद्ध करे। जैसे विदुषी स्त्री और विद्वान् पुरुषों की गृहाश्रम के कर्त्तव्य कर्मों में प्रीति हो, वैसा उपदेश किया करे॥५९॥
Subject
फिर वही विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

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