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Yajurveda Adhyay 15 / Mantra 32

65 Mantra
15/32
Devata- अग्निर्देवता Rishi- परमेष्ठी ऋषिः Chhand- विराड् बृहती Swara- मध्यमः
Mantra with Swara
ए॒ना वो॑ऽअ॒ग्निं नम॑सो॒र्जो नपा॑त॒माहु॑वे। प्रि॒यं चेति॑ष्ठमर॒तिꣳस्व॑ध्व॒रं विश्व॑स्य दू॒तम॒मृत॑म्॥३२॥

ए॒ना। वः॒। अ॒ग्निम्। नम॑सा। ऊ॒र्जः। नपा॑तम्। आ। हु॒वे॒। प्रि॒यम्। चेति॑ष्ठम्। अ॒र॒तिम्। स्व॒ध्व॒रमिति॑ सुऽअ॒ध्व॒रम्। विश्व॑स्य। दू॒तम्। अ॒मृत॑म् ॥३२ ॥

Mantra without Swara
एना वोऽअग्निन्नमसोर्जा नपातमा हुवे । प्रियञ्चेतिष्ठमरतिँ स्वध्वरँ विश्वस्य दूतममृतम् ॥

एना। वः। अग्निम्। नमसा। ऊर्जः। नपातम्। आ। हुवे। प्रियम्। चेतिष्ठम्। अरतिम्। स्वध्वरमिति सुऽअध्वरम्। विश्वस्य। दूतम्। अमृतम्॥३२॥

Meaning
हे मनुष्यो! जैसे मैं (वः) तुम्हारे लिये (एना) उस पूर्वोक्त (नमसा) ग्रहण के योग्य अन्न से (नपातम्) दृढ़ स्वभाव (प्रियम्) प्रीतिकारक (चेतिष्ठम्) अत्यन्त चेतनता करानेहारे (अरतिम्) चेतनता रहित (स्वध्वरम्) अच्छे रक्षणीय व्यवहारों से युक्त (अमृतम्) कारणरूप से नित्य (विश्वस्य) सम्पूर्ण जगत् के (दूतम्) सब ओर चलनेहारे (अग्निम्) बिजुली को और (ऊर्जः) पराक्रमों को (आहुवे) स्वीकार करूँ, वैसे तुम लोग भी मेरे लिये ग्रहण करो॥३२॥
Essence
हे मनुष्यो! हम लोग तुम्हारे लिये जो अग्नि आदि की विद्या प्रसिद्ध करें, उनको तुम लोग स्वीकार करो॥३२॥
Subject
फिर वह कैसा हो, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

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