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Yajurveda Adhyay 13 / Mantra 6

58 Mantra
13/6
Devata- ईश्वरो देवता Rishi- हिरण्यगर्भ ऋषिः Chhand- भुरिगुष्णिक् Swara- ऋषभः
Mantra with Swara
नमो॑ऽस्तु स॒र्पेभ्यो॒ ये के च॑ पृथि॒वीमनु॑। येऽ अ॒न्तरि॑क्षे॒ ये दि॒वि तेभ्यः॑ स॒र्पेभ्यो॒ नमः॑॥६॥

नमः॑। अ॒स्तु॒। स॒र्पेभ्यः॑। ये। के। च॒। पृ॒थि॒वीम्। अनु॑। ये। अ॒न्तरि॑क्षे। ये। दि॒वि। तेभ्यः॑। स॒र्पेभ्यः॑। नमः॑ ॥६ ॥

Mantra without Swara
नमो स्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथिवीमनु । येऽअन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः ॥

नमः। अस्तु। सर्पेभ्यः। ये। के। च। पृथिवीम्। अनु। ये। अन्तरिक्षे। ये। दिवि। तेभ्यः। सर्पेभ्यः। नमः॥६॥

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Meaning
जो (के) कोई इस जगत् में लोक-लोकान्तर और प्राणी हैं (तेभ्यः) उन (सर्पेभ्यः) लोकों के जीवों के लिये (नमः) अन्न (अस्तु) हो। (ये) जो (अन्तरिक्षे) आकाश में (ये) जो (दिवि) प्रकाशमान सूर्य्य आदि लोकों में (च) और (ये) जो (पृथिवीम्) भूमि के (अनु) ऊपर चलते हैं, उन (सर्पेभ्यः) प्राणियों के लिये (नमः) अन्न प्राप्त होवे॥६॥
Essence
हे मनुष्यो! जितने लोक दीख पड़ते हैं, और जो नहीं दीख पड़ते हैं, वे सब अपनी-अपनी कक्षा में नियम से स्थिर हुए आकाश मार्ग में घूमते हैं, उन सबों में जो प्राणी चलते हैं, उन के लिये अन्न भी ईश्वर ने रचा है कि जिससे इन सब का जीवन होता है, इस बात को तुम लोग जानो॥६॥
Subject
मनुष्यों को संसार में कैसे वर्त्तना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥