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Yajurveda - Mantra 49

Yajurveda Adhyay 13 / Mantra 49

58 Mantra
13/49
Devata- अग्निर्देवता Rishi- विरूप ऋषिः Chhand- कृतिः Swara- निषादः
Mantra with Swara
इ॒मꣳ सा॑ह॒स्रꣳ श॒तधा॑र॒मुत्सं॑ व्य॒च्यमा॑नꣳ सरि॒रस्य॒ मध्ये॑। घृ॒तं दुहा॑ना॒मदि॑तिं॒ जना॒याग्ने॒ मा हि॑ꣳसीः पर॒मे व्यो॑मन्। ग॒व॒यमा॑र॒ण्यमनु॑ ते दिशामि॒ तेन॑ चिन्वा॒नस्त॒न्वो निषी॑द। ग॒व॒यं ते॒ शुगृ॑च्छतु॒ यं द्वि॒ष्मस्तं ते॒ शुगृ॑च्छतु॥४९॥

इ॒मम्। सा॒ह॒स्रम्। श॒तधा॑र॒मिति॑ श॒तऽधा॑रम्। उत्स॑म्। व्य॒च्यमा॑न॒मिति॑ विऽअ॒च्यमा॑नम्। स॒रि॒रस्य॑। मध्ये॑। घृ॒तम्। दुहा॑नाम्। अ॒दि॑तिम्। जना॑य। अग्ने॑। मा। हि॒ꣳसीः॒। प॒र॒मे। व्यो॑म॒न्निति॒ विऽओ॑मन्। ग॒व॒यम्। आ॒र॒ण्यम्। अनु॑। ते॒। दि॒शा॒मि॒। तेन॑। चि॒न्वा॒नः। त॒न्वः᳖। नि। सी॒द॒। ग॒व॒यम्। ते॒। शुक्। ऋ॒च्छ॒तु॒। यम्। द्वि॒ष्मः। तम्। ते॒। शुक्। ऋ॒च्छ॒तु॒ ॥४९ ॥

Mantra without Swara
इमँ साहस्रँ शतधारमुत्सँव्यच्यमानँ सरिरस्य मध्ये । घृतन्दुहानामदितिञ्जनायाग्ने मा हिँसीः परमे व्योमन् । गवयमारण्यमनु ते दिशामि तेन चिन्वानस्तन्वो निषीद । गवयन्ते शुगृच्छतु यन्द्विष्मस्तन्ते शुगृच्छतु ॥

इमम्। साहस्रम्। शतधारमिति शतऽधारम्। उत्सम्। व्यच्यमानमिति विऽअच्यमानम्। सरिरस्य। मध्ये। घृतम्। दुहानाम्। अदितिम्। जनाय। अग्ने। मा। हिꣳसीः। परमे। व्योमन्निति विऽओमन्। गवयम्। आरण्यम्। अनु। ते। दिशामि। तेन। चिन्वानः। तन्वः। नि। सीद। गवयम्। ते। शुक्। ऋच्छतु। यम्। द्विष्मः। तम्। ते। शुक्। ऋच्छतु॥४९॥

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) दया को प्राप्त हुए परोपकारक राजन्! तू (जनाय) मनुष्यादि प्राणी के लिये (इमम्) इस (साहस्रम्) असंख्य सुखों का साधन (शतधारम्) असंख्य दूध की धाराओं के निमित्त (व्यच्यमानम्) अनेक प्रकार से पालन के योग्य (उत्सम्) कुए के समान रक्षा करनेहारे वीर्य्यसेचक बैल और (घृतम्) घी को (दुहानाम्) पूर्ण करती हुई (अदितिम्) नहीं मारने योग्य गौ को (मा हिंसीः) मत मार और (ते) तेरे राज्य में जिस (आरण्यम्) वन में रहने वाले (गवयम्) गौ के समान नीलगाय से खेती की हानि होती हो तो उस को (अनुदिशामि) उपदेश करता हूँ, (तेन) उसके मारने से सुरक्षित अन्न से (परमे) उत्कृष्ट (व्योमन्) सर्वत्र व्यापक परमात्मा और (सरिरस्य) विस्तृत व्यापक आकाश के (मध्ये) मध्य में (चिन्वानः) वृद्धि को प्राप्त हुआ तू (तन्वः) शरीर मध्य में (निषीद) निवास कर (ते) तेरा (शुक्) शोक (तम्) उस (गवयम्) रोझ को (ऋच्छतु) प्राप्त होवे और (यम्) जिस (ते) तेरे शत्रु का (द्विष्मः) हम लोग द्वेष करें, उस को भी (शुक्) शोक (ऋच्छतु) प्राप्त होवे॥४९॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। हे राजपुरुषो! तुम लोगों को चाहिये कि जिन बैल आदि पशुओं के प्रभाव से खेती आदि काम; जिन गौ आदि से दूध, घी आदि उत्तम पदार्थ होते हैं कि जिन के दूध आदि से सब प्रजा की रक्षा होती है, उनको कभी मत मारो और जो जन इन उपकारक पशुओं को मारें, उनको राजादि न्यायाधीश अत्यन्त दण्ड देवें और जो जङ्गल में रहने वाले नीलगाय आदि प्रजा की हानि करें, वे मारने योग्य हैं॥४९॥
Subject
फिर मनुष्यों को कौन पशु न मारने और कौन मारने चाहियें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥