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Yajurveda Adhyay 13 / Mantra 47

58 Mantra
13/47
Devata- अग्निर्देवता Rishi- विरूप ऋषिः Chhand- विराड ब्राह्मी पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
इ॒मं मा हि॑ꣳसीर्द्वि॒पादं॑ प॒शुꣳ स॑हस्रा॒क्षो मेधा॑य ची॒यमा॑नः। म॒युं प॒शुं मेध॑मग्ने जुषस्व॒ तेन॑ चिन्वा॒नस्त॒न्वो निषी॑द। म॒युं ते॒ शुगृ॑च्छतु॒ यं द्वि॒ष्मस्तं ते॒ शुगृ॑च्छतु॥४७॥

इ॒मम्। मा। हि॒ꣳसीः॒। द्वि॒पाद॒मिति द्वि॒ऽपाद॑म्। प॒शुम्। स॒ह॒स्रा॒क्ष इति॑ सहस्रऽअ॒क्षः। मेधा॑य। ची॒यमा॑नः। म॒युम्। प॒शुम्। मेध॑म्। अ॒ग्ने। जु॒ष॒स्व॒। तेन॑। चि॒न्वा॒नः। त॒न्वः᳖। नि। सी॒द॒। म॒युम्। ते॒। शुक्। ऋ॒च्छ॒तु॒। यम्। द्वि॒ष्मः। तम्। ते॒। शुक्। ऋ॒च्छ॒तु॒ ॥४७ ॥

Mantra without Swara
इमम्मा हिँसीर्द्विपादम्पशुँ सहस्राक्षो मेधाय चीयमानः । मयुम्पशुम्मेधमग्ने जुषस्व तेन चिन्वानस्तन्वो निषीद । मयुन्ते शुगृच्छतु यन्द्विष्मस्तन्ते शुगृच्छतु ॥

इमम्। मा। हिꣳसीः। द्विपादमिति द्विऽपादम्। पशुम्। सहस्राक्ष इति सहस्रऽअक्षः। मेधाय। चीयमानः। मयुम्। पशुम्। मेधम्। अग्ने। जुषस्व। तेन। चिन्वानः। तन्वः। नि। सीद। मयुम्। ते। शुक्। ऋच्छतु। यम्। द्विष्मः। तम्। ते। शुक्। ऋच्छतु॥४७॥

Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के समान मनुष्य के जन्म को प्राप्त हुए (मेधाय) सुख की प्राप्ति के लिये (चीयमानः) बढ़े हुए (सहस्राक्षः) हजारह प्रकार की दृष्टि वाले राजन्! तू (इमम्) इस (द्विपादम्) दो पग वाले मनुष्यादि और (मेधम्) पवित्रकारक फलप्रद (मयुम्) जंगली (पशुम्) गवादि पशु जीव को (मा) मत (हिंसीः) मारा कर, उस (पशुम्) पशु की (जुषस्व) सेवा कर, (तेन) उस पशु से (चिन्वानः) बढ़ता हुआ तू (तन्वः) शरीर में (निषीद) निरन्तर स्थिर हो, यह (ते) तेरे से (शुक्) शोक (मयुम्) शस्यादिनाशक जंगली पशु को (ऋच्छतु) प्राप्त होवे (ते) तेरे (यम्) जिस शत्रु से हम लोग (द्विष्मः) द्वेष करें, (तम्) उसको (शुक्) शोक (ऋच्छतु) प्राप्त होवे॥४७॥
Essence
कोई भी मनुष्य सब के उपकार करनेहारे पशुओं को कभी न मारे, किन्तु इनकी अच्छे प्रकार रक्षा कर और इन से उपकार ले के सब मनुष्यों को आनन्द देवे। जिन जंगली पशुओं से ग्राम के पशु, खेती और मनुष्यों की हानि हो, उनको राजपुरुष मारें और बन्धन करें॥४७॥
Subject
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

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