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Yajurveda Adhyay 13 / Mantra 44

58 Mantra
13/44
Devata- अग्निर्देवता Rishi- विरूप ऋषिः Chhand- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
वरू॑त्रीं॒ त्वष्टु॒र्वरु॑णस्य॒ नाभि॒मविं॑ जज्ञा॒ना रज॑सः॒ पर॑स्मात्। म॒ही सा॑ह॒स्रीमसु॑रस्य मा॒यामग्ने॒ मा हि॑ꣳसीः पर॒मे व्यो॑मन्॥४४॥

वरू॑त्रीम्। त्वष्टुः॑। वरु॑णस्य। नाभि॑म्। अवि॑म्। ज॒ज्ञा॒नाम्। रज॑सः। पर॑स्मात्। म॒हीम्। सा॒ह॒स्रीम्। असु॑रस्य। मा॒याम्। अग्ने॑। मा। हि॒ꣳसीः॒। प॒र॒मे। व्यो॑मन्निति॒ विऽओ॑मन् ॥४४ ॥

Mantra without Swara
वरूत्रीन्त्वष्टुर्वरुणस्य नाभिमविञ्जज्ञानाँ रजसः परस्मात् । महीँ साहस्रीमसुरस्य मायामग्ने मा हिँसीः पर्मे व्योमन् ॥

वरूत्रीम्। त्वष्टुः। वरुणस्य। नाभिम्। अविम्। जज्ञानाम्। रजसः। परस्मात्। महीम्। साहस्रीम्। असुरस्य। मायाम्। अग्ने। मा। हिꣳसीः। परमे। व्योमन्निति विऽओमन्॥४४॥

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1 Bhashyas
Meaning
हे (अग्ने) विद्वान् पुरुष! आप (त्वष्टुः) छेदनकर्त्ता सूर्य्य के (वरूत्रीम्) ग्रहण करने योग्य (वरुणस्य) जल की (नाभिम्) रोकनेहारी (परस्मात्) श्रेष्ठ (रजसः) लोक से (जज्ञानाम्) उत्पन्न हुई (असुरस्य) मेघ की (मायाम्) जताने वाली बिजुली को और (साहस्रीम्) असंख्य भूगोलयुक्त बहुत फल देनेहारी (अविम्) रक्षा आदि का निमित्त (परमे) सब से उत्तम (व्योमन्) आकाश के समान व्याप्त जगदीश्वर में वर्त्तमान (महीम्) विस्तारयुक्त पृथिवी को (मा) मत (हिंसीः) नष्ट कीजिये॥४४॥
Essence
सब मनुष्यों को चाहिये कि जो यह पृथिवी उत्तम कारण से उत्पन्न हुई, सूर्य्य जिसका आकर्षणकर्त्ता, जल का आधार, मेघ का निमित्त, असंख्य सुख देनेहारी परमेश्वर ने रची है; उसको गुण, कर्म और स्वभाव से जान के सुख के लिये उपयुक्त करें॥४४॥
Subject
फिर उस विद्वान् को क्या नहीं करना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥