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Yajurveda Adhyay 13 / Mantra 43

58 Mantra
13/43
Devata- अग्निर्देवता Rishi- विरूप ऋषिः Chhand- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
अज॑स्र॒मिन्दु॑मरु॒षं भु॑र॒ण्युम॒ग्निमी॑डे पू॒र्वचि॑त्तिं॒ नमो॑भिः। स पर्व॑भिर्ऋतु॒शः कल्प॑मानो॒ गां मा हि॑ꣳसी॒रदि॑तिं वि॒राज॑म्॥४३॥

अज॑स्रम्। इन्दु॑म्। अ॒रु॒षम्। भु॒र॒ण्युम्। अ॒ग्निम्। ई॒डे॒। पू॒र्वचि॑त्ति॒मिति॑ पू॒र्वऽचि॑त्तिम्। नमो॑भि॒रिति॒ नमः॑ऽभिः। सः। पर्व॑भि॒रिति॒ पर्व॑ऽभिः। ऋ॒तु॒श इत्यृ॑तु॒ऽशः। कल्प॑मानः। गाम्। मा। हि॒ꣳसीः॒। अदि॑तिम्। वि॒राज॒मिति॑ वि॒ऽराज॑म् ॥४३ ॥

Mantra without Swara
अजस्रमिन्दुमरुषम्भुरण्युमग्निमीडे पूर्वचित्ति नमोभिः । स पर्वभिरृतुशः कल्पमानो गाम्मा हिँसीरदितिं विराजम् ॥

अजस्रम्। इन्दुम्। अरुषम्। भुरण्युम्। अग्निम्। ईडे। पूर्वचित्तिमिति पूर्वऽचित्तिम्। नमोभिरिति नमःऽभिः। सः। पर्वभिरिति पर्वऽभिः। ऋतुश इत्यृतुऽशः। कल्पमानः। गाम्। मा। हिꣳसीः। अदितिम्। विराजमिति विऽराजम्॥४३॥

Meaning
हे विद्वान् पुरुष! जैसे मैं (पर्वभिः) पूर्ण साधनयुक्त (नमोभिः) अन्नों के साथ वर्त्तमान (इन्दुम्) जलरूप (अरुषम्) घोड़े के सदृश (भुरण्युम्) पोषण करने वाली (पूर्वचित्तिम्) प्रथम निर्मित (अग्निम्) बिजुली को (अजस्रम्) निरन्तर (ईडे) अधिकता से खोजता हूँ, उसको (ऋतुशः) प्रति ऋतु में (कल्पमानः) समर्थ होके करता हुआ (अदितिम्) अखण्डित (विराजम्) विविध प्रकार के पदार्थों से शोभायमान (गाम्) पृथिवी को नष्ट नहीं करता हूँ, वैसे ही (सः) सो आप इस अग्नि और इस पृथिवी को (मा) मत (हिंसीः) नष्ट कीजिये॥४३॥
Essence
मनुष्यों को योग्य है कि ऋतुओं के अनुकूल क्रिया से अग्नि, जल और अन्न का सेवन करके राज्य और पृथिवी की सदैव रक्षा करें, जिससे सब सुख प्राप्त होवें॥४३॥
Subject
फिर वह विद्वान् क्या करे, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

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