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Yajurveda - Mantra 37

Yajurveda Adhyay 13 / Mantra 37

58 Mantra
13/37
Devata- अग्निर्देवता Rishi- विरूप ऋषिः Chhand- निचृद्गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
यु॒क्ष्वा हि दे॑व॒हूत॑माँ॒२ऽ अश्वाँ॑२ऽ अग्ने र॒थीरि॑व। नि होता॑ पू॒र्व्यः स॑दः॥३७॥

यु॒क्ष्व। हि। दे॒व॒हूत॑मा॒निति॑ देव॒ऽहूत॑मान्। अश्वा॑न्। अ॒ग्ने॒। र॒थीरि॒वेति॑ र॒थीःऽइ॑व। नि। होता॑। पू॒र्व्यः। स॒दः॒ ॥३७ ॥

Mantra without Swara
युक्ष्वा हि देवहूतमाँऽअश्वाँऽअग्ने रथीरिव । नि होता पूर्व्यः सदः ॥

युक्ष्व। हि। देवहूतमानिति देवऽहूतमान्। अश्वान्। अग्ने। रथीरिवेति रथीःऽइव। नि। होता। पूर्व्यः। सदः॥३७॥

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Meaning
हे (अग्ने) विद्वान् पुरुष! (पूर्व्यः) पूर्व विद्वानों से शिक्षा को प्राप्त (होता) दानशील आप (देवहूतमान्) विद्वानों से स्पर्द्धा वा शिक्षा किये (अश्वान्) घोड़ों को (रथीरिव) शत्रुओं के साथ बहुत रथादि सेना अंगयुक्त योद्धा के समान (युक्ष्व) युक्त कीजिये (हि) निश्चय कर के न्यायासन पर (निषदः) निरन्तर स्थित हूजिये॥३७॥
Essence
सेनापति आदि राजपुरुषों को चाहिये कि बड़े सेना के अङ्गयुक्त रथ वाले के समान घोड़े आदि सेना के अवयवों को कार्यों में संयुक्त करें और सभापति आदि को चाहिये कि न्यायासन पर बैठ कर धर्मयुक्त न्याय किया करें॥३७॥
Subject
अब राजपुरुषों को क्या करना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥