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Yajurveda Adhyay 13 / Mantra 32

58 Mantra
13/32
Devata- द्यावापृथिव्यौ देवते Rishi- गोतम ऋषिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
म॒ही द्यौः पृ॑थि॒वी च॑ नऽ इ॒मं य॒ज्ञं मि॑मिक्षताम्। पि॒पृ॒तां नो॒ भरी॑मभिः॥३२॥

म॒ही। द्यौः। पृ॒थि॒वी। च॒। नः॒। इ॒मम्। य॒ज्ञम्। मि॒मि॒क्ष॒ता॒म्। पि॒पृ॒ताम्। नः॒। भरी॑मभि॒रिति॒ भरी॑मऽभिः ॥३२ ॥

Mantra without Swara
मही द्यौः पृथिवी च न इमँ यज्ञं मिमिक्षताम् । पिपृतान्नो भरीमभिः ॥

मही। द्यौः। पृथिवी। च। नः। इमम्। यज्ञम्। मिमिक्षताम्। पिपृताम्। नः। भरीमभिरिति भरीमऽभिः॥३२॥

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Meaning
हे माता-पिता! जैसे (मही) बड़ा (द्यौः) सूर्य्यलोक (च) और (पृथिवी) भूमि सब संसार को सींचते और पालन करते हैं, वैसे तुम दोनों (नः) हमारे (इमम्) इस (यज्ञम्) सेवने योग्य विद्याग्रहणरूप व्यवहार को (मिमिक्षताम्) सेचन अर्थात् पूर्ण होने की इच्छा करो और (भरीमभिः) धारण-पोषण आदि कर्मों से (नः) हमारा (पिपृताम्) पालन करो॥३२॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे वसन्त ऋतु में पृथिवी और सूर्य्य सब संसार का धारण, प्रकाश और पालन करते हैं, वैसे माता-पिता को चाहिये कि अपने सन्तानों के लिये वसन्तादि ऋतुओं में अन्न, विद्यादान और अच्छी शिक्षा करके पूर्ण विद्वान् पुरुषार्थी करें॥३२॥
Subject
माता पिता अपने सन्तानों को कैसी शिक्षा करें, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥