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Yajurveda - Mantra 14

Yajurveda Adhyay 13 / Mantra 14

58 Mantra
13/14
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वामदेव ऋषिः Chhand- भुरिगनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
अ॒ग्निर्मू॒र्द्धा दि॒वः क॒कुत्पतिः॑ पृथि॒व्याऽ अ॒यम्। अ॒पा रेता॑सि जिन्वति। इन्द्र॑स्य॒ त्वौज॑सा सादयामि॥१४॥

अ॒ग्निः। मू॒र्द्धा। दि॒वः। क॒कुत्। पतिः॑। पृ॒थि॒व्याः। अ॒यम्। अ॒पाम्। रेता॑सि। जि॒न्व॒ति॒। इन्द्र॑स्य। त्वा॒। ओज॑सा। सा॒द॒या॒मि॒ ॥१४ ॥

Mantra without Swara
अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम् । अपाँ रेताँसि जिन्वति । इन्द्रस्य त्वौजसा सादयामि ॥

अग्निः। मूर्द्धा। दिवः। ककुत्। पतिः। पृथिव्याः। अयम्। अपाम्। रेतासि। जिन्वति। इन्द्रस्य। त्वा। ओजसा। सादयामि॥१४॥

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1 Bhashyas
Meaning
हे राजन्! जैसे (अयम्) यह (अग्निः) सूर्य्य (दिवः) प्रकाशयुक्त आकाश के बीच और (पृथिव्याः) भूमि का (मूर्द्धा) सब प्राणियों के शिर के समान उत्तम (ककुत्) सब से बड़ा (पतिः) सब पदार्थों का रक्षक (अपाम्) जलों के (रेतांसि) सारों से प्राणियों को (जिन्वति) तृप्त करता है, वैसे आप भी हूजिये। मैं (त्वा) आप को (इन्द्रस्य) सूर्य्य के (ओजसा) पराक्रम के साथ राज्य के लिये (सादयामि) स्थापन करता हूँ॥१४॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो मनुष्य सूर्य्य के समान गुण, कर्म्म और स्वभाव वाला, न्याय से प्रजा के पालन में तत्पर, धर्मात्मा, विद्वान् हो, उसको राज्याधिकारी सब लोग मानें॥१४॥
Subject
फिर वह राजपुरुष कैसा हो, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥