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Yajurveda - Mantra 11

Yajurveda Adhyay 13 / Mantra 11

58 Mantra
13/11
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वामदेव ऋषिः Chhand- निचृत्त्रिष्टुप् Swara- धैवतः
Mantra with Swara
प्रति॒ स्पशो॒ विसृ॑ज॒ तूर्णि॑तमो॒ भवा॑ पा॒युर्वि॒शोऽ अ॒स्या अद॑ब्धः। यो नो॑ दू॒रेऽ अ॒घश॑ꣳसो॒ योऽ अन्त्यग्ने॒ माकि॑ष्टे॒ व्यथि॒राद॑धर्षीत्॥११॥

प्रति॑। स्पशः॑। वि। सृ॒ज॒। तूर्णि॑तम॒ इति॒ तूर्णि॑ऽतमः। भव॑। पा॒युः। वि॒शः। अ॒स्याः। अद॑ब्धः। यः। नः॒। दू॒रे। अ॒घश॑ꣳस॒ इत्य॒घऽश॑ꣳसः। यः। अन्ति॑। अग्ने॑। माकिः॑। ते॒। व्यथिः॑। आ। द॒ध॒र्षी॒त् ॥११ ॥

Mantra without Swara
प्रति स्पशो विसृज तूर्णितमो भवा पायुर्विशो अस्याऽअदब्धः । योनो दूरेऽअघशँसो योऽअन्त्यग्ने माकिष्टे व्यथिरादधर्षीत् ॥

प्रति। स्पशः। वि। सृज। तूर्णितम इति तूर्णिऽतमः। भव। पायुः। विशः। अस्याः। अदब्धः। यः। नः। दूरे। अघशꣳस इत्यघऽशꣳसः। यः। अन्ति। अग्ने। माकिः। ते। व्यथिः। आ। दधर्षीत्॥११॥

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Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के समान शत्रुओं के जलाने वाले पुरुष! (ते) आपका और (नः) हमारा (यः) जो (व्यथिः) व्यथा देने हारा (अघशंसः) पाप करने में प्रवृत्त चोर शत्रुजन (दूरे) दूर तथा (यः) जो (अन्ति) निकट है, जैसे वह हम लोगों को (माकिः) नहीं (आ, दधर्षीत्) दुःख देवे, उस शत्रु के (प्रति) प्रति आप (तूर्णितमः) शीघ्र दण्डदाता होके (स्पशः) बन्धनों को (विसृज) रचिये और (अस्याः) इस वर्त्तमान (विशः) प्रजा के (पायुः) रक्षक (अदब्धः) हिंसारहित (भव) हूजिये॥११॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जो समीप वा दूर रहने वाले प्रजाओं के दुःखदायी डाकू हैं, उनको राजा आदि पुरुष साम, दाम, दण्ड और भेद से शीघ्र वश में लाके दया और न्याय से धर्मयुक्त प्रजाओं की निरन्तर रक्षा करें॥११॥
Subject
फिर वह कैसा हो, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥