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Yajurveda Adhyay 13 / Mantra 10

58 Mantra
13/10
Devata- अग्निर्देवता Rishi- वामदेव ऋषिः Chhand- भुरिक् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
तव॑ भ्र॒मास॑ऽ आशु॒या प॑त॒न्त्यनु॑ स्पृश धृष॒ता शोशु॑चानः। तपू॑ष्यग्ने जु॒ह्वाड्ट पत॒ङ्गानस॑न्दितो॒ विसृ॑ज॒ विष्व॑गु॒ल्काः॥१०॥

तव॑। भ्र॒मासः॑। आ॒शु॒येत्या॑शु॒या। प॒त॒न्ति॒। अनु॑। स्पृ॒श॒। धृ॒ष॒ता। शोशु॑चानः। तपू॑षि। अ॒ग्ने॒। जु॒ह्वा᳖। प॒त॒ङ्गान्। अस॑न्दित॒ इत्यस॑म्ऽदितः। वि। सृ॒ज॒। विष्व॑क्। उ॒ल्काः ॥१० ॥

Mantra without Swara
तव भ्रमास आशुया पतन्त्यनु स्पृश धृषता शोशुचानः । तपूँष्यग्ने जुह्वा पतङ्गानसन्दितो विसृज विष्वगुल्काः ॥

तव। भ्रमासः। आशुयेत्याशुया। पतन्ति। अनु। स्पृश। धृषता। शोशुचानः। तपूषि। अग्ने। जुह्वाड्ट। पतङ्गान्। असन्दित इत्यसम्ऽदितः। वि। सृज। विष्वक्। उल्काः॥१०॥

Meaning
हे (अग्ने) अग्नि के समान तेजस्वी सेनापते! (शोशुचानः) अत्यन्त पवित्र आचरण करने हारे आप जो (तव) आप के (भ्रमासः) भ्रमणशील वीर पुरुष जैसे (विष्वक्) सब ओर से (आशुया) शीघ्र चलनेहारी (उल्काः) बिजुली की गतियां वैसे (पतन्ति) श्येनपक्षी के समान शत्रुओं के दल में तथा शत्रुओं में गिरते हैं, उनको (धृषता) दृढ़ सेना से (अनु) अनुकूल (स्पृश) प्राप्त हूजिये और (असन्दितः) अखण्डित हुए (जुह्वा) घी के हवन का साधन लपट अग्नि के (तपूंषि) तेज के समान शत्रुओं के ऊपर सब ओर से बिजुली को (विसृज) छोडि़ये और (पतङ्गान्) घोड़ों को सुन्दर शिक्षायुक्त कीजिये॥१०॥
Essence
इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। सेनापति और सेना के भृत्यों को चाहिये कि आपस में प्रीति के साथ बल बढ़ा वीर पुरुषों को हर्ष दें और सम्यक् युद्ध करा के अग्नि आदि अस्त्रों और भुशुण्डी आदि शस्त्रों से शत्रुओं के ऊपर बिजुली की वृष्टि करें, जिस से शीघ्र विजय हो॥१०॥
Subject
फिर वह सेनापति क्या करे, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

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