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Yajurveda Adhyay 12 / Mantra 116

117 Mantra
12/116
Devata- अग्निर्देवता Rishi- विरूप ऋषिः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
तुभ्यं॒ ताऽअ॑ङ्गिरस्तम॒ विश्वाः॑ सुक्षि॒तयः॒ पृथ॑क्। अग्ने॒ कामा॑य येमिरे॥११६॥

तुभ्य॑म्। ताः। अ॒ङ्गि॒र॒स्त॒मेत्य॑ङ्गिरःऽतम। विश्वाः॑। सु॒क्षि॒तय॒ इति॑ सुऽक्षि॒तयः॑। पृथ॑क्। अग्ने॑। कामा॑य। ये॒मि॒रे॒ ॥११६ ॥

Mantra without Swara
तुभ्यन्ता अङ्गिरस्तम विश्वाः सुक्षितयः पृथक् । अग्ने कामाय येमिरे ॥

तुभ्यम्। ताः। अङ्गिरस्तमेत्यङ्गिरःऽतम। विश्वाः। सुक्षितय इति सुऽक्षितयः। पृथक्। अग्ने। कामाय। येमिरे॥११६॥

Meaning
हे (अङ्गिरस्तम) अतिशय करके सार के ग्राहक (अग्ने) प्रकाशमान राजन्! जो (विश्वाः) सब (सुक्षितयः) श्रेष्ठ मनुष्यों वाली प्रजा (पृथक्) अलग (कामाय) इच्छा की सिद्धि के लिये (तुभ्यम्) तुम्हारे लिये (येमिरे) प्राप्त होवें, (ताः) उन प्रजाओं की आप निरन्तर रक्षा कीजिये॥११६॥
Essence
जहां प्रजा के लोग धर्मात्मा राजा को प्राप्त हो के अपनी अपनी इच्छा पूरी करते हैं, वहां राजा की वृद्धि क्यों न होवे?॥११६॥
Subject
अब राजा क्या करे, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

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