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Yajurveda - Mantra 8

Yajurveda Adhyay 11 / Mantra 8

83 Mantra
11/8
Devata- सविता देवता Rishi- प्रजापतिर्ऋषिः Chhand- भुरिक् शक्वरी Swara- धैवतः
Mantra with Swara
इ॒मं नो॑ देव सवितर्य॒ज्ञं प्रण॑य देवा॒व्यꣳ सखि॒विद॑ꣳ सत्रा॒जितं॑ धन॒जित॑ꣳ स्व॒र्जित॑म्। ऋ॒चा स्तोम॒ꣳ सम॑र्धय गाय॒त्रेण॑ रथन्त॒रं बृ॒हद् गा॑य॒त्रव॑र्त्तनि॒ स्वाहा॑॥८॥

इ॒मम्। नः॒। दे॒व॒। स॒वि॒तः॒। य॒ज्ञम्। प्र। न॒य॒। दे॒वा॒व्य᳖मिति॑ देवऽअ॒व्य᳖म्। स॒खि॒विद॒मिति॑ सखि॒ऽविद॑म्। स॒त्रा॒जित॒मिति॑ सत्रा॒ऽजित॑म्। ध॒न॒जित॒मिति॑ धन॒ऽजित॑म्। स्व॒र्जित॒मिति॑ स्वः॒ऽजित॑म्। ऋ॒चा। स्तोम॑म्। सम्। अ॒र्ध॒य॒। गा॒य॒त्रेण॑। र॒थ॒न्त॒रमिति॑ रथम्ऽत॒रम्। बृ॒हत्। गा॒य॒त्रव॑र्त्त॒नीति॑ गाय॒त्रऽव॑र्त्तनि। स्वाहा॑ ॥८ ॥

Mantra without Swara
इमन्नो देव सवितर्यज्ञम्प्रणय देवाव्यँ सखिविदँ सत्राजितन्धनजितँ स्वर्जितम् । ऋचा स्तोमँ समर्धय गायत्रेण रथन्तरम्बृहद्गायत्रवर्तनि स्वाहा ॥

इमम्। नः। देव। सवितः। यज्ञम्। प्र। नय। देवाव्यमिति देवऽअव्यम्। सखिविदमिति सखिऽविदम्। सत्राजितमिति सत्राऽजितम्। धनजितमिति धनऽजितम्। स्वर्जितमिति स्वःऽजितम्। ऋचा। स्तोमम्। सम्। अर्धय। गायत्रेण। रथन्तरमिति रथम्ऽतरम्। बृहत्। गायत्रवर्त्तनीति गायत्रऽवर्त्तनि। स्वाहा॥८॥

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Meaning
हे (देव) सत्य कामनाओं को पूर्ण करने और (सवितः) अन्तर्यामिरूप से प्रेरणा करने हारे जगदीश्वर! आप (नः) हमारे (इमम्) पीछे कहे और आगे जिसको कहेंगे उस (देवाव्यम्) दिव्य विद्वान् वा दिव्य गुणों की जिस से रक्षा हो (सखिविदम्) मित्रों को जिस से प्राप्त हों (सत्राजितम्) सत्य को जिससे जीतें (धनजितम्) धन की जिससे उन्नति होवे (स्वर्जितम्) सुख को जिस से बढ़ावें और (ऋचा) ऋग्वेद से जिस की (स्तोमम्) स्तुति हो उस (यज्ञम्) विद्या और धर्म का संयोग कराने हारे यज्ञ को (स्वाहा) सत्य क्रिया के साथ (प्रणय) प्राप्त कीजिये (गायत्रेण) गायत्री आदि छन्द से (गायत्रवर्त्तनि) गायत्री आदि छन्दों की गानविद्या (बृहत्) बड़े (रथन्तरम्) अच्छे यानों से जिस के पार हों, उस मार्ग को (समर्धय) अच्छे प्रकार बढ़ाइये॥८॥
Essence
जो मनुष्य ईर्ष्या द्वेष आदि दोषों को छोड़ ईश्वर के समान सब जीवों के साथ मित्रभाव रखते हैं, वे संपत् को प्राप्त होते हैं॥८॥
Subject
फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥