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Yajurveda Adhyay 10 / Mantra 8

34 Mantra
10/8
Devata- यजमानो देवता Rishi- वरुण ऋषिः Chhand- कृति, Swara- निषादः
Mantra with Swara
क्ष॒त्रस्योल्ब॑मसि क्ष॒त्रस्य॑ ज॒राय्व॑सि क्ष॒त्रस्य॒ योनि॑रसि क्ष॒त्रस्य॒ नाभि॑र॒सीन्द्र॑स्य॒ वार्त्रघ्नमसि मि॒त्रस्या॑सि॒ वरु॑णस्यासि॒ त्वया॒यं वृ॒त्रं व॑धेत्। दृ॒वासि॑ रु॒जासि॑ क्षु॒मासि॑। पा॒तैनं॒ प्राञ्चं॑ पा॒तैनं॒ प्र॒त्यञ्चं॑ पा॒तैनं॑ ति॒र्यञ्चं॑ दि॒ग्भ्यः पा॑त॥८॥

क्ष॒त्रस्य॑। उल्ब॑म्। अ॒सि॒। क्ष॒त्रस्य॑। ज॒रायु॑। अ॒सि॒। क्ष॒त्रस्य॑। योनिः॑। अ॒सि॒। क्ष॒त्रस्य॑। नाभिः॑। अ॒सि॒। इन्द्र॑स्य। वार्त्र॑घ्न॒मिति वार्त्र॑ऽघ्नम्। अ॒सि॒। मि॒त्रस्य॑। अ॒सि॒। वरु॑णस्य। अ॒सि॒। त्वया॑। अ॒यम्। वृ॒त्रम्। व॒धे॒त्। दृ॒वा। अ॒सि॒। रु॒जा। अ॒सि॒। क्षु॒मा। अ॒सि॒। पा॒त। ए॒न॒म्। प्राञ्च॑म्। पा॒त। ए॒न॒म्। प्र॒त्यञ्च॑म्। पा॒त। ए॒न॒म्। ति॒र्यञ्च॑म्। दि॒ग्भ्य इति॑ दि॒क्ऽभ्यः पा॒त॒ ॥८॥

Mantra without Swara
क्षत्रस्योल्वमसि क्षत्रस्य जराय्वसि क्षत्रस्य योनिरसि क्षत्रस्य नाभिरसीन्द्रस्य वात्रघ्नमसी मित्रस्यासि वरुणस्यासि त्वयायँवृत्रँवधेत् । दृवासि रुजासि क्षुमासि । पातैनम्प्राञ्चम्पातैनम्प्रत्यञ्चम्पातैन्तिर्यञ्चन्दिग्भ्यः पात ॥

क्षत्रस्य। उल्बम्। असि। क्षत्रस्य। जरायु। असि। क्षत्रस्य। योनिः। असि। क्षत्रस्य। नाभिः। असि। इन्द्रस्य। वार्त्रघ्नमिति वार्त्रऽघ्नम्। असि। मित्रस्य। असि। वरुणस्य। असि। त्वया। अयम्। वृत्रम्। वधेत्। दृवा। असि। रुजा। असि। क्षुमा। असि। पात। एनम्। प्राञ्चम्। पात। एनम्। प्रत्यञ्चम्। पात। एनम्। तिर्यञ्चम्। दिग्भ्य इति दिक्ऽभ्यः पात॥८॥

Meaning
हे राजन्! जो आप (क्षत्रस्य) अपने राजकुल में (उल्बम्) बलवान् (असि) हैं, (क्षत्रस्य) क्षत्रिय पुरुष को (जरायु) वृद्धावस्था देनेहारे (असि) हैं, (क्षत्रस्य) राज्य के (योनिः) निमित्त (असि) हैं, (क्षत्रस्य) राज्य के (नाभिः) प्रबन्धकर्त्ता (असि) हैं, (इन्द्रस्य) सूर्य्य के (वार्त्रघ्नम्) मेघ का नाश करनेहारे के समान कर्मकर्त्ता (असि) हैं, (मित्रस्य) मित्र के मित्र (असि) हैं, (वरुणस्य) श्रेष्ठ पुरुषों के साथ श्रेष्ठ (असि) हैं, (दृवा) शत्रुओं के विदारण करने वाले (असि) हैं, (रुजा) शत्रुओं को रोगातुर करनेहारे (असि) हैं और (क्षुमा) सत्य का उपदेश करनेहारे (असि) हैं, जो (अयम्) यह वीर पुरुष (त्वया) आप राजा के साथ (वृत्रम्) मेघ के समान न्याय के छिपाने वाले शत्रु को (वधेत्) मारे (एनम्) इस (प्राञ्चम्) प्रथम प्रबन्ध करने वाले (एनम्) राजपुरुष की तुम लोग (दिग्भ्यः) सब दिशाओं से (पात) रक्षा करो, (प्रत्यञ्चम्) पीछे खड़े हुए सेनापति की (पात) रक्षा करो, इस (तिर्य्यञ्चम्) तिरछे खड़े हुए (एनम्) राजपुरुष की (पात) रक्षा करो॥८॥
Essence
जो कन्या और पुत्रों में स्त्री और पुरुषों मे विद्या बढ़ाने वाला कर्म है, वही राज्य का बढ़ाने, शत्रुओं का विनाश और धर्म आदि की प्रवृत्ति कराने वाला होता है। इसी कर्म से सब कालों और सब दिशाओं में रक्षा होती है॥८॥
Subject
सब प्रजापुरुषों को योग्य है कि सब प्रकार से योग्य सभापति राजा की निरन्तर सब ओर से रक्षा करें, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

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