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Yajurveda - Mantra 13

Yajurveda Adhyay 10 / Mantra 13

34 Mantra
10/13
Devata- यजमानो देवता Rishi- वरुण ऋषिः Chhand- आर्ची पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः
Mantra with Swara
उदी॑ची॒मारो॑हानु॒ष्टुप् त्वा॑वतु वैरा॒जꣳ सामै॑कवि॒॑ꣳश स्तोमः॑ श॒रदृ॒तुः फलं॒ द्रवि॑णम्॥१३॥

उदाची॑म्। आ। रो॒ह॒। अ॒नु॒ष्टुप्। अ॒नु॒स्तुबित्य॑नु॒ऽस्तुप्। त्वा॒। अ॒व॒तु॒। वै॒रा॒जम्। साम॑। ए॒क॒वि॒ꣳश इत्ये॑कऽवि॒ꣳशः। स्तोमः॑। श॒रत्। ऋ॒तुः। फल॑म्। द्रवि॑णम् ॥१३॥

Mantra without Swara
उदीचीमारोहानुष्टुप्त्वावतु वैराजँ सामैकविँश स्तोमः शरदृतुः पलन्द्रविणम् ॥

उदाचीम्। आ। रोह। अनुष्टुप्। अनुस्तुबित्यनुऽस्तुप्। त्वा। अवतु। वैराजम्। साम। एकविꣳश इत्येकऽविꣳशः। स्तोमः। शरत्। ऋतुः। फलम्। द्रविणम्॥१३॥

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Meaning
हे सभापति राजा! आप (उदीचीम्) उत्तर की दिशा में (आरोह) प्रसिद्धि को प्राप्त हूजिये, जिससे (अनुष्टुप्) जिसको पढ़ के सब विद्याओं से दूसरों की स्तुति करें, वह छन्द (वैराजम्) अनेक प्रकार के अर्थों से शोभायमान (साम) सामवेद का भाग (एकविंशः) सोलह कला, चार पुरुषार्थ के अवयव और एक कर्त्ता इन इक्कीस को पूरण करनेहारा (स्तोमः) स्तुति का विषय (शरत्) शरद् (ऋतुः) ऋतु (द्रविणम्) ऐश्वर्य्य और (फलम्) फलरूप सेवाकारक शूद्रकुल (त्वा) आपको (अवतु) प्राप्त होवे॥१३॥
Essence
जो पुरुष आलस्य को छोड़ सब समय में पुरुषार्थ का अनुष्ठान करते हैं, वे अच्छे फलों को भोगते हैं॥१३॥
Subject
फिर राजा आदि पुरुषों को क्या प्राप्त करना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥