1-Balkand

Shrimadvalmikiya Ramayan

Sarga 21 / Shloka 22 Balkand

Kand 1-Balkand
Sarga 21
Shloka 22

Balkand

77 Sarga
22 Shloka
1/21/22
1-Balkand / Sarga 21 Shloka 22
Shloka
इति मुनिवचनात् प्रसन्नचित्तो
रघुवृषभः च मुमोद पार्थिवाग्र्यः ।
गमनमभिरुरोच राघवस्य
प्रथितयशाः कुशिकात्मजाय बुद्ध्या ॥१-२१-२२॥

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Shrimadvalmikiya Ramayan (Gitapress) - हिन्दी
Meaning

महर्षि वसिष्ठके इस वचनसे विख्यात यशवाले रघुकुलशिरोमणि नृपश्रेष्ठ दशरथका मन प्रसन्न हो गया। वे आनन्दमग्न हो गये और बुद्धिसे विचार करनेपर विश्वामित्रजीकी प्रसन्नताके लिये उनके साथ श्रीरामका जाना उन्हें रुचिके अनुकूल प्रतीत होने लगा॥ २२॥

Footnote

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें इक्कीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २१॥