Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

Samveda Mantra 72

1874 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- वसिष्ठो मैत्रावरुणिः Chhand- त्रिपाद विराड् गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣ग्निं꣢꣫ नरो꣣ दी꣡धि꣢तिभिर꣣र꣢ण्यो꣣र्ह꣡स्त꣢च्युतं जनयत प्रश꣣स्त꣢म् । दूरे꣣दृ꣡शं꣢ गृ꣣ह꣡प꣢तिमथ꣣व्यु꣢म् ॥७२॥

अ꣣ग्नि꣢म् । न꣡रः꣢꣯ । दी꣡धि꣢꣯तिभिः । अ꣣र꣡ण्योः꣢ । ह꣡स्त꣢꣯च्युतम् । ह꣡स्त꣢꣯ । च्यु꣣तम् । जनयत । प्रशस्त꣢म् । प्र꣣ । श꣢स्तम् । दू꣣रेदृ꣡श꣢म् । दू꣣रे । दृ꣡ष꣢꣯म् । गृ꣣ह꣡ प꣢तिम् । गृ꣣ह꣢ । प꣣तिम् । अथव्यु꣢म् । अ꣣ । थव्यु꣢म् ॥७२॥

Mantra without Swara
अग्निं नरो दीधितिभिररण्योर्हस्तच्युतं जनयत प्रशस्तम् । दूरेदृशं गृहपतिमथव्युम् ॥

अग्निम् । नरः । दीधितिभिः । अरण्योः । हस्तच्युतम् । हस्त । च्युतम् । जनयत । प्रशस्तम् । प्र । शस्तम् । दूरेदृशम् । दूरे । दृषम् । गृह पतिम् । गृह । पतिम् । अथव्युम् । अ । थव्युम् ॥७२॥

Samveda - Mantra Number : 72
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 7;

Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
भा० = ( नरः ) = नेता, अग्रणी लोग ( दीधितिभिः ) = किरणों और अंगुलियों द्वारा ( अरण्यो: ) = अरणियों के बीच में ( हस्तच्युतम् ) = हाथों के बल से उत्पन्न हुए, अग्नि के समान द्यौ और पृथिवी के बीच में अपनी शक्ति से स्वयं स्थित, ( प्रशस्तम् ) = सबसे उत्तम, निर्दोष, ( दूरे दृशम् ) = दूर तक दिखाई देने वाले या दूर तक देखने वाले, ( गृहपतिम् ) = घर के स्वामी के समान समस्त प्रजा के रक्षक ( अथव्युम् ) = गतिशील दूर तक पहुंचने वाले व्यापक ( अग्निम् ) = अग्नि, परमेश्वर को ( जनयत ) उत्पन्न करते, प्रकट करते हैं ।

अर्थात् जैसे अरणियों के बीच अग्नि, प्राण और अपान के बीच में आत्मा, माता पिता के बीच में पुत्र है उसी प्रकार द्यौ: और पृथिवी के बीच वह परमेश्वर शक्तिरूप से प्रकट है ।
 
Subject
परमेश्वर की स्तुति
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
ऋषिः - वसिष्ठ:।

छन्द: - त्रिपाद्विराड्गायत्री  ।