Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

Samveda Mantra 580

1874 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- ऋजिश्वा भारद्वाजः Chhand- ककुप् Swara- ऋषभः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
आ꣡ सो꣢ता꣣ प꣡रि꣢ षिञ्च꣣ता꣢श्वं꣣ न꣡ स्तोम꣢꣯म꣣प्तु꣡र꣢ꣳ रज꣣स्तु꣡र꣢म् । व꣣नप्रक्ष꣡मु꣢द꣣प्रु꣡त꣢म् ॥५८०॥

आ꣢ । सो꣣त । प꣡रि꣢꣯ । सि꣣ञ्चत । अ꣡श्व꣢꣯म् । न । स्तो꣡म꣢꣯म् । अ꣣प्तु꣡र꣢म् । र꣣जस्तु꣡र꣢म् । व꣣नप्रक्ष꣢म् । व꣣न । प्रक्ष꣢म् । उ꣣दप्रु꣡त꣢म् । उ꣣द । प्रु꣡त꣢꣯म् ॥५८०॥

Mantra without Swara
आ सोता परि षिञ्चताश्वं न स्तोममप्तुरꣳ रजस्तुरम् । वनप्रक्षमुदप्रुतम् ॥

आ । सोत । परि । सिञ्चत । अश्वम् । न । स्तोमम् । अप्तुरम् । रजस्तुरम् । वनप्रक्षम् । वन । प्रक्षम् । उदप्रुतम् । उद । प्रुतम् ॥५८०॥

Samveda - Mantra Number : 580
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 11;

Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
 भा० = हे साधकगण ! ( स्तोमं ) = स्तुति योग्य, ( अप्तुरं ) = ज्ञान और कर्मों से प्राप्त करने योग्य ( रजस्तुरम् ) = समस्त लोकों में व्यापक ( वनप्रक्षम् ) = सबके आत्माओ  में कूटस्थरूप से व्यापक, फलों को जैसे वृक्ष देता है उसी प्रकार सेवन करने योग्य आनन्दरसों को देने वाले ( उद-प्रुतम् ) = ज्ञान से परिपूर्ण, शान्ति के दायक, आत्मरस को ( आसोत ) = अपने हृदय में प्रकट करो । ( परि षिञ्चत ) = पुनः उसक आनन्दमय रसों का आ सेचन करो । 
Subject
"Missing"
Footnote
५८० – ‘वनऋक्षम्' इति ऋ० । 'वनकृक्षम्' इति केचित ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
ऋषिः - ऋजिश्वा भारद्वाजः।

देवता - पवमान:।

छन्दः - ककुप्।

स्वरः - ऋषभः।