Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

Samveda Mantra 573

1874 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- द्वित आप्त्यः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣡ पु꣢ना꣣ना꣡य꣢ वे꣣ध꣢से꣣ सो꣡मा꣢य꣣ व꣡च꣢ उच्यते । भृ꣣तिं꣡ न भ꣢꣯रा म꣣ति꣡भि꣢र्जु꣣जो꣡ष꣢ते ॥५७३॥

प्र꣢ । पु꣣नाना꣡य꣢ । वे꣣ध꣡से꣢ । सो꣡मा꣢꣯य । व꣡चः꣢꣯ । उ꣣च्यते । भृति꣢म् । न । भ꣣र । मति꣡भिः꣢ । जु꣣जो꣡ष꣢ते ॥५७३॥

Mantra without Swara
प्र पुनानाय वेधसे सोमाय वच उच्यते । भृतिं न भरा मतिभिर्जुजोषते ॥

प्र । पुनानाय । वेधसे । सोमाय । वचः । उच्यते । भृतिम् । न । भर । मतिभिः । जुजोषते ॥५७३॥

Samveda - Mantra Number : 573
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 10;

Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
भा०  = ( वेधसे ) = स्वयं कर्म के विधाता मेधावी ( पुनानाय ) = अन्तकरण को मलादि से रहित करने वाले ( सोमाय ) = शम दम आदि सौम्य गुणों से युक्त आत्मा या योगिजन के लिये ( वचः ) = सब अध्यात्म वाणियों का ( प्र-उच्यते ) = प्रवचन किया जाता है उपदेश किया जाता है । ( मतिभिः ) = अपने मनन-क्रियाओं द्वारा स्वयं उपासक ( जुजोषते ) = उस सोमस्वरूप अपने ही आत्मरस का सेवन करता है । हे उपासक लोगो ! जिस प्रकार ( भृतिं न ) = श्रमी को नियम से भरण पोषण को द्रव्य या आजीविका दी जाती है उसी प्रकार उस आत्मा की शक्ति को बढ़ाने वाली ( भृतिं  ) = भरण पोषणकारिणी चिति शक्ति को ( भर ) = नियम से अभ्यास द्वारा बढ़ाओ  ।

द्वितो नाम ऋषिः स्वामानं प्रत्याह, इति सायणः । सोमाय 'मेधाविने' इति माधवः ।


 
Subject
"Missing"
Footnote
५७३ - ‘वच उद्यतम्' इति ऋ० । 'उद्यते' इति सायणः । 
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
ऋषिः - द्वित आप्त्यः।

देवता - इन्द्र:।

छन्दः - उष्णिक्।

स्वरः - ऋषभः।