Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

Samveda Mantra 568

1874 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- पर्वतनारदौ काण्वौ Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- पावमानं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- पावमानं पर्व
Mantra with Swara
स꣡खा꣢य꣣ आ꣡ नि षी꣢꣯दत पुना꣣ना꣢य꣣ प्र꣡ गा꣢यत । शि꣢शुं꣣ न꣢ य꣣ज्ञैः꣡ परि꣢꣯ भूषत श्रि꣣ये꣢ ॥५६८॥

स꣡खा꣢꣯यः । स । खा꣣यः । आ꣢ । नि । सी꣣दत । पुनाना꣡य꣢ । प्र । गा꣣यत । शि꣡शुम् । न । य꣣ज्ञैः꣢ । प꣡रि꣢꣯ । भू꣣षत । श्रिये꣢ ॥५६८॥

Mantra without Swara
सखाय आ नि षीदत पुनानाय प्र गायत । शिशुं न यज्ञैः परि भूषत श्रिये ॥

सखायः । स । खायः । आ । नि । सीदत । पुनानाय । प्र । गायत । शिशुम् । न । यज्ञैः । परि । भूषत । श्रिये ॥५६८॥

Samveda - Mantra Number : 568
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 6; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 10;

Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
 भा०  = है ( सखायः ) = मित्रगण ! ( आ निषीदत) = आओ बैठो। ( पुनानाय ) = योग साधन द्वारा अपने त्रिविध मलों का शोधन करनेहारे आत्मा के विषय में ( प्र गायत ) = उत्तम रूप से सत् स्तुति करो उसका वर्णन करो ।  और ( शिशुं न ) = जैसे बालक को ( श्रिये ) = मात्र शोभा के लिये सजाते हैं उसी प्रकार उस ( शिशुम् ) = सबके भीतर शयन करने हारे आत्मा को ( यज्ञैः ) = ज्ञान और कर्म दोनों प्रकार के यज्ञों द्वारा ( श्रिये ) = आत्म सम्पत्ति प्राप्त करने के लिये ( परि भूषत ) = सब प्रकार से अलंकृत करो, उसकी शोभा बढाओ ।
Subject
"Missing"
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
 

ऋषिः - पर्वतनारदौ काश्यप्यावप्सरसौ वा।

देवता - इन्द्र:।

छन्दः - उष्णिक्।

स्वरः - ऋषभः।