Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

Samveda Mantra 455

1874 Mantra
Devata- विश्वेदेवाः Rishi- आत्रेयः Chhand- द्विपदा त्रिष्टुप् Swara- धैवतः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
ऊ꣣र्जा꣢ मि꣣त्रो꣡ वरु꣢꣯णः पिन्व꣣ते꣢डाः꣣ पी꣡व꣢री꣣मि꣡षं꣢ कृणु꣣ही꣡ न꣢ इन्द्र ॥४५५

ऊ꣣र्जा꣢ । मि꣣त्रः꣢ । मि꣣ । त्रः꣢ । व꣡रु꣢꣯णः । पि꣣न्वत । इ꣡डाः꣢꣯ । पी꣡व꣢꣯रीम् । इ꣡ष꣢꣯म् । कृ꣣णुहि꣢ । नः꣣ । इन्द्र ॥४५५॥

Mantra without Swara
ऊर्जा मित्रो वरुणः पिन्वतेडाः पीवरीमिषं कृणुही न इन्द्र ॥४५५

ऊर्जा । मित्रः । मि । त्रः । वरुणः । पिन्वत । इडाः । पीवरीम् । इषम् । कृणुहि । नः । इन्द्र ॥४५५॥

Samveda - Mantra Number : 455
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 11;

Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
भा० = ( मित्रो वरुणः ) = मित्र और वरुण, सूर्य और मेघ मिलकर ( ऊर्जा ) = विद्युत्  रूप बल, पराक्रम से युक्त होकर ( इडा: ) = जिस प्रकार भूमियों को जलों से ( पिन्वत ) = सेचन करते हैं उसी प्रकार आत्मा और परमात्मा दोनों मिलकर समाधिकाल में आत्मा की मनो  भूमियों को धर्ममेघ के रस से आ  सेचित करें। और हे ( इन्द्र ) = मेघ ! आप ( इषं  ) = अन्न की फसल को ( पीवरीं  ) = खूब अधिक मात्रा में, जोरों पर कसरत से ( कृणुहि ) = उत्पन्न करते हो उसी प्रकार हे आत्मन् ! आप ( इषं ) = अभिलाषायोग्य परम सुख की अधिक मात्रा को ( कृणुहि ) = उत्पन्न करो । 
Subject
"Missing"
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
 

ऋषिः - आत्रेयः।

देवता - विश्वेदेवाः।

छन्दः - द्विपदा त्रिष्टुप्।

स्वरः - धैवतः।