Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

Samveda Mantra 451

1874 Mantra
Devata- उषाः Rishi- संवर्त आङ्गिरसः Chhand- द्विपदा विराट् Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
उ꣣षा꣢꣫ अप꣣ स्व꣢सु꣣ष्ट꣢मः꣣ सं꣡ व꣢र्त्तयति वर्त꣣नि꣡ꣳ सु꣢जा꣣त꣡ता꣢ ॥४५१

उ꣣षाः꣢ । अ꣡प꣢꣯ । स्व꣡सुः꣢꣯ । त꣡मः꣢꣯ । सम् । व꣣र्त्तयति । वर्त्तनि꣢म् । सु꣣जात꣡ता꣢ । सु꣣ । जात꣣ता꣢ ॥४५१॥१

Mantra without Swara
उषा अप स्वसुष्टमः सं वर्त्तयति वर्तनिꣳ सुजातता ॥४५१

उषाः । अप । स्वसुः । तमः । सम् । वर्त्तयति । वर्त्तनिम् । सुजातता । सु । जातता ॥४५१॥१

Samveda - Mantra Number : 451
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 11;

Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
भा० = ( उषा ) = अन्धकार को नष्ट करने वाली उषा  ( स्वसुः ) = जिस प्रकार रात्रि के ( तमः ) = अन्धकार को ( सुजातता ) = अपने उत्तम प्रादुर्भाव के कारण ( अप ) = दूर कर देती है और राहगीर को ( वर्त्तनिं ) = सन्मार्ग में ( संवर्त्तयति ) = रखती है, उसी प्रकार विशोका प्रज्ञा का उदय भी ( स्वसुः ) = स्वयं सरण करने वाली अविद्या के अन्धकार को दूर करती और आत्मा के परम गन्तव्य ब्रह्म मार्ग को प्रकाशित कर देती है ।
Subject
"Missing"
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
ऋषिः - सम्वर्त:। 

देवता - उषाः।

छन्दः - द्विपदापंक्ति:।

स्वरः - पञ्चमः।