Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

Samveda Mantra 444

1874 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रसदस्युः Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
उ꣡प꣢ प्र꣣क्षे꣡ मधु꣢꣯मति क्षि꣣य꣢न्तः꣣ पु꣡ष्ये꣢म र꣣यिं꣢ धी꣣म꣡हे꣢ त इन्द्र ॥४४४॥

उ꣡प꣢꣯ । प्र꣣क्षे꣢ । प्र꣣ । क्षे꣢ । म꣡धु꣢꣯मति । क्षि꣣य꣡न्तः꣢ । पु꣡ष्ये꣢꣯म । र꣣यि꣢म् । धी꣣म꣡हे꣢ । ते꣣ । इन्द्र ॥४४४॥

Mantra without Swara
उप प्रक्षे मधुमति क्षियन्तः पुष्येम रयिं धीमहे त इन्द्र ॥

उप । प्रक्षे । प्र । क्षे । मधुमति । क्षियन्तः । पुष्येम । रयिम् । धीमहे । ते । इन्द्र ॥४४४॥

Samveda - Mantra Number : 444
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 10;

Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
भा० = हे ( इन्द्र ) = परमेश्वर ! ( मधुमति ) = मधुर फल से सम्पन्न ( प्रक्षे  ) = बट आदि वृक्ष पर आश्रय लेकर जिस  प्रकार पक्षिगण और राजा का आश्रय लेकर जीव प्रजागण जिस प्रकार सुख और ऐश्वर्य प्राप्त करते हैं उसी प्रकार ( प्रक्षे ) = विशाल ब्रह्माण्ड में ( क्षियन्तः ) = निवास करते हुए हम जीव ( रयिम् ) = अपने उत्तम कर्मफल को ( पुण्येम ) = प्राप्त करें और उन् से वृद्धि को प्राप्त हों और ( ते धीमहि ) = हम तेरा ध्यान करें ।

ब्रह्माण्ड रूप परम प्लक्ष या चमस का वर्णन उपनिषदों में तथा वेदमन्त्रों में वर्णित है । इसी प्लक्ष से द्यौ भूमि बनाई गई है। वहां कर्मफल या मोक्षरूप मधु है । देखो बृहदारण्यक  ओर छान्दोग्य के मधुविद्याप्रकरण जिसमें पृथिवी आदि को मधु कहा है। मस्तकरूप चमस में वैसे इन्द्रिय गण का आत्मा के प्रति वचन भी स्पष्ट है । 
Subject
"Missing"
Footnote
४४४ –‘पुष्पन्तो' इति ऋ० ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
ऋषिः -नोपलभ्यते । 

देवता - इन्द्रः।

छन्दः - पङ्क्तिः।

स्वरः - पञ्चमः।