Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

Samveda Mantra 430

1874 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- ऋण0त्रसदस्यू Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
प꣡व꣢स्व सोम म꣣हे꣢꣫ दक्षा꣣या꣢श्वो꣣ न꣢ नि꣣क्तो꣢ वा꣣जी꣡ धना꣢य ॥४३०॥

प꣡व꣢꣯स्व । सो꣣म । महे꣢ । द꣡क्षा꣢꣯य । अ꣡श्वः꣢꣯ । न । नि꣣क्तः꣢ । वा꣣जी꣢ । ध꣡ना꣢꣯य ॥४३०॥

Mantra without Swara
पवस्व सोम महे दक्षायाश्वो न निक्तो वाजी धनाय ॥

पवस्व । सोम । महे । दक्षाय । अश्वः । न । निक्तः । वाजी । धनाय ॥४३०॥

Samveda - Mantra Number : 430
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 9;

Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
भा० = हे  सोम ! ( निक्त: ) = स्नान किया हुआ, निष्णात ( वाजी ) = ज्ञानवान् विद्वान, ( अश्वः ) = क्रियानिष्ठ, सधाया हुआ पुरुष और घोड़ा जिस प्रकार ( धनाय ) = धनोपार्जन या संग्राम के लिये जाता है उसी प्रकार ( महे ) = बड़े ( धनाय ) = गतिशील या धन्य ( दक्षाय ) = कर्मनिष्ठ साधक जीव के लिये आप ( पवस्व ) = द्रवित हों, कृपायुक्त  हों, आनन्द रूप में प्रकट हों ।
Subject
"Missing"
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
ऋषिः - ऐश्वरा धिष्ण्या अग्नयः ।

देवता - पवमानः।

छन्दः - द्विपदा पङ्क्तिः।

स्वरः - पञ्चमः।