Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

Samveda Mantra 429

1874 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- ऋण0त्रसदस्यू Chhand- द्विपदा विराट् पङ्क्तिः Swara- पञ्चमः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
प꣡व꣢स्व सोम म꣣हा꣡न्त्स꣢मु꣣द्रः꣢ पि꣣ता꣢ दे꣣वा꣢नां꣣ वि꣢श्वा꣣भि꣡ धाम꣢꣯ ॥४२९॥

प꣡व꣢꣯स्व । सो꣣म । महा꣢न् । स꣣मुद्रः꣢ । स꣣म् । उद्रः꣢ । पि꣣ता꣢ । दे꣣वा꣡ना꣢म् । वि꣡श्वा꣢꣯ । अ꣣भि꣢ । धा꣡म꣢꣯ ॥४२९॥

Mantra without Swara
पवस्व सोम महान्त्समुद्रः पिता देवानां विश्वाभि धाम ॥

पवस्व । सोम । महान् । समुद्रः । सम् । उद्रः । पिता । देवानाम् । विश्वा । अभि । धाम ॥४२९॥

Samveda - Mantra Number : 429
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 5; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 4; Khand » 9;

Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
भा० = हे ( सोम ) = सबके प्रेरक परमात्मन् ! आप ( महान् समुद्र:) = बड़े भारी समुद्र हैं, समस्त रसों और आनन्दों के स्रोत और भण्डार हैं, ( देवानां ) = समस्त देवों, भूतों और इन्द्रियों के ( पिता ) = पालक और प्रेरक हैं, अतः ( विश्वा धाम ) = समस्त तेजों को या समस्त आत्मा के निवासस्थान रूप देहों या हृदयों के प्रति ( परि पवस्व ) = आप द्रवित होइये । उनमें स्वयं आनन्द रस का संचार कीजिये ।
Subject
"Missing"
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
ऋषिः - ऐश्वरा धिष्ण्या अग्नयः। 

देवता - पवमानः।

छन्दः - त्रिपदा अनुष्टुपपिपीलिकामध्या।

स्वरः - गान्धारः।