Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

Samveda Mantra 222

1874 Mantra
Devata- विष्णुः Rishi- मेधातिथिः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣दं꣢꣫ विष्णु꣣र्वि꣡ च꣢क्रमे त्रे꣣धा꣡ नि द꣢꣯धे प꣣द꣢म् । स꣡मू꣢ढमस्य पाꣳसु꣣ले꣡ ॥२२२॥

इ꣣द꣢म् । वि꣡ष्णुः꣢꣯ । वि । च꣣क्रमे । त्रेधा꣢ । नि । द꣣धे । पद꣢म् । स꣡मू꣢꣯ढम् । सम् । ऊढम् । अस्य । पासुले꣢ ॥२२२॥

Mantra without Swara
इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदम् । समूढमस्य पाꣳसुले ॥

इदम् । विष्णुः । वि । चक्रमे । त्रेधा । नि । दधे । पदम् । समूढम् । सम् । ऊढम् । अस्य । पासुले ॥२२२॥

Samveda - Mantra Number : 222
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 11;

Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
भा० = ( विष्णुः ) = देह में सर्वव्यापक वह आत्मा ( इदं ) = इस प्रकार ( विचक्रमे ) = गति करता है कि ( त्रेधा ) = तीन प्रकार से ( पदम्१  ) =  अपनी शक्ति को ( निदधे ) = स्थापन करता है। और ( अस्य ) = इसकी वह शक्ति सामर्थ्य ( पांसुले२   ) = इन्द्रियों के शयन करने के स्थान देह में ( स मूढम् ) = उत्तम रूप से प्रकट है। परमात्मा पक्ष में ईश्वर की शक्ति तीनो लोकों में है। 'पांसवो  लोकाः' । इस ब्रह्माण्ड भर में उसकी शक्ति समूहित   या व्याप्त है । 
आत्मा की त्रेधा शक्ति अन्न से रस का ग्रहण इन्द्रिय से ज्ञान निष्पादन और देह में प्राण और रस का संचरण ।
Subject
परमेश्वर की स्तुति
Footnote
२२२-'पांशुरे’, ‘पांसुरे’ इति पाठः, य० । 
१. पदं पद्यतेर्गतिकर्मणः ।
२. पांसवः पादै: सूयन्ते इति वा पन्नाः शेरत इति वा ( नि० ११/१८) 
 
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
ऋषिः - मेधातिथिः।

देवता -इन्द्र: ।

छन्दः - गायत्री।

स्वरः - षड्जः।