Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

Samveda Mantra 220

1874 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनो जमदग्निर्वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
आ꣡ नो꣢ मित्रावरुणा घृ꣣तै꣡र्गव्यू꣢꣯तिमुक्षतम् । म꣢ध्वा꣣ र꣡जा꣢ꣳसि सुक्रतू ॥२२०॥

आ꣢ । नः꣣ । मित्रा । मि । त्रा । वरुणा । घृतैः꣢ । ग꣡व्यू꣢꣯तिम् । गो । यू꣣तिम् । उक्षतम् । म꣡ध्वा꣢꣯ । र꣡जाँ꣢꣯सि । सु꣣क्रतू । सु । क्रतूइ꣡ति꣢ ॥२२०॥

Mantra without Swara
आ नो मित्रावरुणा घृतैर्गव्यूतिमुक्षतम् । मध्वा रजाꣳसि सुक्रतू ॥

आ । नः । मित्रा । मि । त्रा । वरुणा । घृतैः । गव्यूतिम् । गो । यूतिम् । उक्षतम् । मध्वा । रजाँसि । सुक्रतू । सु । क्रतूइति ॥२२०॥

Samveda - Mantra Number : 220
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 11;

Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
भा० = हे ( मित्रावरुणौ ) = मित्र, वरुण, प्राण और अपान ( घृतैः ) = दीप्तियों द्वारा  ( गव्यूतिम् ) = इन्द्रियों के मिलने के स्थान त्रिपुटीभाग को अथवा गायों के बाड़े के समान एकमात्र आश्रयस्थान आत्मा को ( आ उक्षतम् ) = योगज आनंद-रसों से खूब सेचन करो ।  हे ( सुऋतू ) = उत्तम प्रज्ञा और कर्म के सम्पादन करने हारे तुम दोनो ! ( नः ) = हमारे ( रजांसि ) = रजोभाव से युक्त इन्द्रियों को अथवा हमारे लोकों को द्यो और पृथिवी या दिन और रात्रि के समान ( मध्वा१   ) = मधु अर्थात् विशेष चेतना या संवित्सिद्धिद्वारा ( उक्षतम् ) = सेचन करो। प्राण और अपान की साधना से त्रिपुटी में दीप्ति और इन्द्रियों में विशेष स्फूर्ति उत्पन्न होती है जिसको 'संवित् ज्ञान' कहते हैं ।
Subject
परमेश्वर की स्तुति
Footnote
 १. मधु धमतेर्गतिकर्मणः ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
ऋषिः - विश्वामित्र: जमदग्निर्वा ।

देवता - इन्द्रः।

छन्दः - गायत्री।

स्वरः - षड्जः।