Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

Samveda Mantra 210

1874 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
धा꣣ना꣡व꣢न्तं कर꣣म्भि꣡ण꣢मपू꣣प꣡व꣢न्तमु꣣क्थि꣡न꣢म् । इ꣡न्द्र꣢ प्रा꣣त꣡र्जु꣢षस्व नः ॥२१०॥

धा꣣ना꣡व꣢न्तम् । क꣣रम्भि꣡ण꣢म् । अ꣣पूप꣡व꣢न्तम् । उ꣣क्थि꣡न꣢म् । इ꣡न्द्र꣢꣯ । प्रा꣣तः꣢ । जु꣣षस्व । नः ॥२१०॥

Mantra without Swara
धानावन्तं करम्भिणमपूपवन्तमुक्थिनम् । इन्द्र प्रातर्जुषस्व नः ॥

धानावन्तम् । करम्भिणम् । अपूपवन्तम् । उक्थिनम् । इन्द्र । प्रातः । जुषस्व । नः ॥२१०॥

Samveda - Mantra Number : 210
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 10;

Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
भा० = हे ( इन्द्र ) = आत्मन् ! ( नः ) = हमारे ( प्रातः ) = प्रातःकाल के अवसर में ( धानावन्तं ) = ध्यान धारणा से सम्पन्न, ( करम्भिणम् ) = सुख को प्रारम्भ करने वाले, ( अषूपवन्तम् ) = अति समीपता दिलाने वाले अथवा दूर और निकट सर्वत्र विद्यमान ( उक्थिनं ) = ज्ञानसम्पन्न सोम, आत्मा को ( ज़ुषस्व ) = ग्रहण करो, स्वीकार करो । 

भुंने जौ  'धाना' कहाते हैं, दही से मिले सत्तू 'करम्भ' कहाते हैं ।  पके पुरोडाश को 'अपूप ' कहा जाता है । प्रतिनिधिवाद से, सूक्ष्मतत्व जब स्पष्ट हो जायं तो वे ही 'धाना' हैं। ध्यानयोग से विवेक द्वारा पवित्र किया सत्य ज्ञान 'सक्तु' है। उसका विशेष रस अनुभव 'दधि' है, जिसका मथन करने पर या विशेष परिपाक होने पर प्राप्त ब्रह्मज्ञान 'अपूप ' है जिसमें आत्मा उस ब्रह्म के समीपतम होजाता है। अथवा [अप-उप-वत् = अपूपवात्  ] वह दूर और निकट के सब पदार्थों को प्राप्त है। उस समय अपूर्व ब्रह्मास्वाद 'उक्थ' है, तद्वान् आत्मा 'उक्थी' है । उसको स्वीकार करने की प्रार्थना है ।
Subject
परमेश्वर की स्तुति
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
ऋषिः - विश्वामित्र:।

देवता - इन्द्रः।

छन्दः - गायत्री।

स्वरः - षड्जः।