Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

Samveda Mantra 161

1874 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रिशोकः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣भि꣡ त्वा꣢ वृषभा सु꣣ते꣢ सु꣣त꣡ꣳ सृ꣢जामि पी꣣त꣡ये꣢ । तृ꣣म्पा꣡ व्य꣢श्नुही꣣ म꣡द꣢म् ॥१६१॥

अ꣣भि꣢ । त्वा꣣ । वृषभ । सुते꣢ । सु꣣त꣢म् । सृ꣣जामि । पीत꣡ये꣢ । तृ꣣म्प꣢ । वि । अ꣣श्नुहि । म꣡द꣢꣯म् ॥१६१॥

Mantra without Swara
अभि त्वा वृषभा सुते सुतꣳ सृजामि पीतये । तृम्पा व्यश्नुही मदम् ॥

अभि । त्वा । वृषभ । सुते । सुतम् । सृजामि । पीतये । तृम्प । वि । अश्नुहि । मदम् ॥१६१॥

Samveda - Mantra Number : 161
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 5;

Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
भा० = हे ( वृषभ ) = अन्तरात्मा में सुख की वर्षा करने हारे श्रेष्ठ! ( सुते ) = सोम=ज्ञान या साधना, कर्म के उचितरूप से होजाने पर उसके ( पीतये) = रस पान करने के लिये ( सुतं ) = उत्तम ज्ञान का ( त्वा अभि  सृजामि ) = तेरे सन्मुख ही सम्पादन करता हूं। ( तृम्प ) = तू उससे तृप्त  हो और ( मदम् ) = हर्ष, सुख को ( वि. अश्नुहि ) = प्राप्त कर। 

योगी, अवधूत लोग समाधि-रस को मद्यरस से तुलना देते हैं और आत्मा को बुलाते हैं। धर्ममेघ समाधि की सिद्धि प्राप्त होजाने पर आत्मा की वह अवस्था होजाती है ।
Subject
"Missing"
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
ऋषिः - त्रिशोकः ।

देवता - इन्द्रः।