Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

Samveda Mantra 151

1874 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्रुतकक्षः सुकक्षो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
इ꣣ष्टा꣡ होत्रा꣢꣯ असृक्ष꣣ते꣡न्द्रं꣢ वृ꣣ध꣡न्तो꣢ अध्व꣣रे꣢ । अ꣡च्छा꣢वभृ꣣थ꣡मोज꣢꣯सा ॥१५१॥

इ꣣ष्टाः꣢ । हो꣡त्राः꣢꣯ । अ꣣सृक्षत । इ꣡न्द्र꣢꣯म् । वृ꣣ध꣡न्तः꣢ । अ꣣ध्वरे꣢ । अ꣡च्छ꣢꣯ । अ꣣वभृथ꣢म् । अ꣣व । भृथ꣢म् । ओ꣡ज꣢꣯सा ॥१५१॥

Mantra without Swara
इष्टा होत्रा असृक्षतेन्द्रं वृधन्तो अध्वरे । अच्छावभृथमोजसा ॥

इष्टाः । होत्राः । असृक्षत । इन्द्रम् । वृधन्तः । अध्वरे । अच्छ । अवभृथम् । अव । भृथम् । ओजसा ॥१५१॥

Samveda - Mantra Number : 151
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 4;

Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
भा० = ( अध्वरे ) = इस हिंसारहित या कभी नष्ट न होने वाले जीवनमय या आत्मज्ञानमय यज्ञ में ( इष्टा: ) = याग करने वाले या विषयरूप हवियों की आहुति प्राप्त करने वाले ( होत्रा:१  ) = ग्राह्य विषयाहुति को भांतर के चितिशक्ति की ज्वाला में हवन करनेवाले सात ऋषि, सात इन्द्रियां ( इन्द्रं वृधन्तः ) = आत्मा के ऐश्वर्य, ज्ञान गौरव को बढ़ाते हुए ( ओजसा ) = ज्ञान और बल से ( अवभृथम् ) = पूर्ण समाप्ति के अवभृथ स्नान पर्यन्त ( अच्छा) = उत्तम रूप से ( असृक्षत ) = यज्ञ करते हैं और बिसर्जन करते हैं ।

ब्राह्म यज्ञ की आध्यात्म व्याख्या का यह मूलमन्त्र है। शिर में सात छिद्र ,२ आंख, २ नाक, २ कान, १ मुख ये सात ऋषि सात होता है मुख्य आसन्य प्राण-आत्मा 'इन्द्र' है, वाक् सरस्वती यज्ञ की सम्पादिका भिषक् है, चितिशक्ति शची है। इत्यादि वैदिक अलंकार हैं। विशेष देखो छान्दोग्य उप० ( अ० ३ । ख० १६, १७। ) 
Subject
"Missing"
Footnote
१. सप्तहोत्रकाः, इति सायणः ।
 
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
ऋषिः - श्रुतकक्षः सुकक्षो वा। 

देवता - इन्द्रः। 

छन्दः - गायत्री। 

स्वरः - षड्ज।