Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

Samveda Mantra 141

1874 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- श्यावाश्व आत्रेयः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
अ꣣द्य꣡ नो꣢ देव सवितः प्र꣣जा꣡व꣢त्सावीः꣣ सौ꣡भ꣢गम् । प꣡रा꣢ दुः꣣ष्व꣡प्न्य꣢ꣳ सुव ॥१४१॥

अ꣣द्य꣢ । अ꣣ । द्य꣢ । नः꣣ । देव । सवितरि꣡ति꣢ । प्र꣣जा꣡व꣢त् । प्र꣣ । जा꣡व꣢꣯त् । सा꣣वीः । सौ꣡भ꣢꣯गम् । सौ । भ꣣गम् । प꣡रा꣢꣯ । दु꣣ष्वप्न्य꣢म् । दुः꣣ । स्व꣡प्न्य꣢꣯म् । सु꣣व ॥१४१॥

Mantra without Swara
अद्य नो देव सवितः प्रजावत्सावीः सौभगम् । परा दुःष्वप्न्यꣳ सुव ॥

अद्य । अ । द्य । नः । देव । सवितरिति । प्रजावत् । प्र । जावत् । सावीः । सौभगम् । सौ । भगम् । परा । दुष्वप्न्यम् । दुः । स्वप्न्यम् । सुव ॥१४१॥

Samveda - Mantra Number : 141
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 3;

Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
भा० = हे ( सवितः ) = सब के प्रेरक, उत्पादक, प्रकाशमान् देव, आत्मन् ! ( नः ) = हमारा ( प्रजावत् ) = अपनी प्रजाओं के समान ( सौभगं ) = उत्तम कल्याण ( अद्य ) = आज, प्रतिदिन ( सावी: ) = उत्पन्न कर । ( दुःष्वप्न्यं  ) = चित्त में से दुःसंकल्पों के कारण होने वाले तन्द्राकालिक प्रमाद को ( परा सुव ) = दूर कर। 

योग के साधनों को करते हुए साधक के आग्रहपूर्वक संयम द्वारा इन्द्रियों का बाह्य निरोध होजाने पर भी मन की पूर्व वासनाएं तन्द्रा के अवसर पर दुःस्वप्नों का कारण होती हैं । उनको दूर करने और शुभ विचारों के प्रबल होने की इस मन्त्र में प्रार्थना है । 
Subject
परमेश्वर की स्तुति
Footnote
१४१ - 'अधानो', 'दुःष्वप्न्यं' 'दुष्ष्वप्न्यं' इति ऋ० । 
 
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
ऋषिः - श्यावाश्व ।

छन्दः - गायत्री।

स्वरः - षड्जः।