Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

Samveda Mantra 134

1874 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- त्रिशोकः काण्वः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
भि꣣न्धि꣢꣫ विश्वा꣣ अ꣢प꣣ द्वि꣢षः꣣ प꣢रि꣣ बा꣡धो꣢ ज꣣ही꣡ मृधः꣢꣯ । व꣡सु꣢ स्पा꣣र्हं꣡ तदा भ꣢꣯र ॥१३४॥

भि꣣न्धि꣢ । वि꣡श्वाः꣢꣯ । अ꣡प꣢꣯ । द्वि꣡षः꣢꣯ । प꣡रि꣢ । बा꣡धः꣢꣯ । ज꣣हि꣢ । मृ꣡धः꣢꣯ । व꣡सु꣢꣯ । स्पा꣣र्ह꣢म् । तत् । आ । भ꣣र ॥१३४॥

Mantra without Swara
भिन्धि विश्वा अप द्विषः परि बाधो जही मृधः । वसु स्पार्हं तदा भर ॥

भिन्धि । विश्वाः । अप । द्विषः । परि । बाधः । जहि । मृधः । वसु । स्पार्हम् । तत् । आ । भर ॥१३४॥

Samveda - Mantra Number : 134
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
भा० = ( विश्वा द्विषः ) = सब द्वेष करने वालों को हे राजन् ! आत्मन् ! ( अप भिन्धि ) = दूर ही काट डाल और ( बाध: ) = पीड़ा   पहुंचाने वाले, ( मृधः ) = संग्रामकारी हिंसक, सेनाओं को ( परि जहि ) = सब और नाश कर ( स्पार्हम् ) = हमारी अभिलाषा के पात्र ( तद् ) = उस ( वसु ) = हमारे भीतरी आत्मरूप धन को ( आ भर ) = हमें प्राप्त करा |

बृहदारण्यक उपनिषद् में 'नवा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं  प्रियं भवति आत्मनस्तु कामाय सर्वं  प्रियं भवति । वेद के शब्दों में आत्मा 'स्पार्हं  ' वसु या सबसे अधिक प्रिय धन है । 'तत्' यह शब्द उस विस्मृत को याद कराता है जिसको हम अविद्या के कारण भूल गये हैं, जिसको मैत्रेयी ने याज्ञवल्क्य से पूछा- येनाहं नामृतास्यां किमहं तेन कुर्याम् । यदेव भगवान् वेद तदेव में ब्रूहि '। इस पर याज्ञवल्क्य ने उक्त  सिद्धान्त कहकर कहा । 'एतावदरे खलु अमृतम् ।' यह 'तत्' अन्य उपनिषदों में भी है जैसे-'तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदु नात्येति कश्चन, तत्वमसि श्वेतकेतो' इत्यादि । 
 
Subject
परमेश्वर की स्तुति
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
 

ऋषिः - त्रिशोकः। 

छन्दः - गायत्री।