Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

Samveda Mantra 125

1874 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- सुकक्षश्रुतकक्षौ Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
उ꣢꣫द्घेद꣣भि꣢ श्रु꣣ता꣡म꣢घं वृष꣣भं꣡ नर्या꣢꣯पसम् । अ꣡स्ता꣢रमेषि सूर्य ॥१२५॥

उ꣢त् । घ꣣ । इ꣢त् । अ꣣भि꣢ । श्रु꣣ता꣡म꣢घम् । श्रु꣣त꣢ । म꣣घम् । वृषभ꣢म् । न꣡र्या꣢꣯पसम् । न꣡र्य꣢꣯ । अ꣣पसम् । अ꣡स्ता꣢꣯रम् । ए꣣षि । सूर्य ॥१२५॥

Mantra without Swara
उद्घेदभि श्रुतामघं वृषभं नर्यापसम् । अस्तारमेषि सूर्य ॥

उत् । घ । इत् । अभि । श्रुतामघम् । श्रुत । मघम् । वृषभम् । नर्यापसम् । नर्य । अपसम् । अस्तारम् । एषि । सूर्य ॥१२५॥

Samveda - Mantra Number : 125
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 4;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 2;

Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
भा० = है ( सूर्य ) = समस्त जगत् को प्रेरणा करने वाले आत्मन् ! तू ( श्रुतामघम् ) = प्रसिद्धि धन ज्ञान और कीर्ति सम्पन्न ( वृषभम् ) = सुख और आनन्द की वर्षा करने वाले, सर्वश्रेष्ठ । ( नर्यावसन् ) = मनुष्यों के हितकारी कार्य करने और मनःसंकल्प करने वाले ( अस्तारम् ) = अपने प्रतिपक्षियों और काम, क्रोध आदि शत्रुओं को मार गिराने वाले, पराक्रमी वीर पुरुष के प्रति ( इद् ह ) = ही तू ( उद् एषि ) = ऊपर उठता है, उदित होता है ।

सदाचारी, परोपकारी काम क्रोधादि के जीतने वाले पुरुषपुंगव का आत्मा सूर्य के समान उन्नति को प्राप्त होता है ।
 
Subject
परमेश्वर की स्तुति
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
ऋषिः - सुकक्षश्रुतकक्षौ।

छन्दः - गायत्री ।