Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

Samveda Mantra 117

1874 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- हर्यतः प्रागाथः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः Kaand Name- ऐन्द्रं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- ऐन्द्रं पर्व
Mantra with Swara
गा꣢व꣣ उ꣡प꣢ वदाव꣣टे꣢ म꣣हि꣢ य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ र꣣प्सु꣡दा꣢ । उ꣣भा꣡ कर्णा꣢꣯ हिर꣣ण्य꣡या꣢ ॥११७॥

गा꣡वः꣢꣯ । उ꣡प꣢꣯ । व꣣द । अवटे꣢ । म꣣ही꣡इति꣢ । य꣣ज्ञ꣡स्य꣢ । र꣣प्सु꣡दा꣢ । र꣣प्सु꣢ । दा꣣ । उभा꣢ । क꣡र्णा꣢꣯ । हि꣣रण्य꣡या꣢ ॥११७॥

Mantra without Swara
गाव उप वदावटे महि यज्ञस्य रप्सुदा । उभा कर्णा हिरण्यया ॥

गावः । उप । वद । अवटे । महीइति । यज्ञस्य । रप्सुदा । रप्सु । दा । उभा । कर्णा । हिरण्यया ॥११७॥

Samveda - Mantra Number : 117
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 3;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 2; Khand » 1;

Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
भा० = हे ( गावः ) = गौओ  ! वाणियो ! रश्मियो ! नदियो ! ( अवटे १  ) = यज्ञस्थान, रक्षास्थान, ईश्वररूप, गंभीर स्थान में ( उपवद ) = आओ, अपना तात्पर्य प्रकाशित करो । अर्थात् गोएं जिस प्रकार रक्षास्थान में, रश्मियें सूर्य में और नदियें गंभीर गर्त्त, जलाशय या समुद्र में आश्रय पाती हैं इसी प्रकार हे वाणियो ! तुम सकल रक्षक परमेश्वर में लगती हो । ( मही ) = विशाल यह पृथ्वी और यह द्यौलोक ( यज्ञस्य ) = यज्ञ का ( रप्सुदा ) = उत्तम फल देनेवाले हैं । ( उभा ) = दोनों ( हिरण्यया ) = हरणशील, भोग्य लोको के प्राप्त कराने में ( कर्णा ) = साधनभूत हैं ।

[टि० - इस मन्त्र पर सब भाष्यकारों के मत भिन्न २ हैं  । यजुर्वेद में महीधर और उवट के मत में – "वे गौए कूए के समीप आवें और पृथ्वी और द्यौ यज्ञ का फल देने वाली है और इनके दोनों कान सोने के हैं ।' सायण के मत से – 'हे ( गावः ) = यज्ञकर्त्ताओ  ! तुम महावीर के पात्र की स्तुति करो यह यज्ञ का फल देता है। उस कूण्डे के दोनों कान सोने के हैं।" स्वामी तुलसीराम के मत से - 'यज्ञकुण्ड के समीप हे वाणियों ! तुम इन्द्र की स्तुति करो जिससे यज्ञभूमि वेदपाठ के प्रवाहवाली हो और श्रोताओं के दोनों कान प्रकाशमय हो ।" इनमें कर्मकाण्ड को लक्ष्य करके यज्ञ के विनियोग के अनुसार सायण महीधरादि की पदयोजना संगत है । परन्तु अध्याहार और उन्नेयार्थता का दूषण है। यही दोष तुलसीरामजी के अर्थ में भी है। हमारी सम्मति में 'ओम्', 'अवत', 'अवट' ये तीनों शब्द रक्षार्थक अव धातु से बने हैं, इसलिये यह मन्त्र परमात्मा की स्तुति पर लगना चाहिये । ]
Subject
परमेश्वर की स्तुति
Footnote
११७–उपावतावतं इति पाठभेदः, ऋ० 
१. यजुर्वेदे अवतं इत्यस्य अवटं  गर्त्तमिति उवटमहीधरयोः सम्मतोर्थः अवतीत्यवतं रक्षास्थलं । अवटं  कूपम् । रक्षादायकत्वादेव इन्द्रोप्यवटशब्दवाच्यः शरण्यत्वादेव । अवतीत्योम् । समानधातुवशाद ओंकारः परमेश्वर एव  सर्वस्तुतिवाचां शरणमित्यवदात्म् ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
 

ऋषिः - हर्यतः प्रागाथः।

छन्दः - गायत्री।