Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

Samveda Mantra 114

1874 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विश्वमना वैयश्वः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
य꣡द्वा उ꣢꣯ वि꣣श्प꣡तिः꣢ शि꣣तः꣡ सुप्री꣢꣯तो꣣ म꣡नु꣢षो वि꣣शे꣢ । वि꣢꣫श्वेद꣣ग्निः꣢꣫ प्रति꣣ र꣡क्षा꣢ꣳसि सेधति ॥११४॥

य꣢द् । वै । उ꣣ । विश्प꣡तिः꣢ । शि꣣तः꣢ । सु꣡प्री꣢꣯तः । सु । प्री꣣तः म꣡नु꣢꣯षः । वि꣣शे꣢ । वि꣡श्वा꣢꣯ । इत् । अ꣣ग्निः꣢ । प्र꣡ति꣢꣯ । रक्षाँ꣢꣯सि । से꣣धति ॥११४॥

Mantra without Swara
यद्वा उ विश्पतिः शितः सुप्रीतो मनुषो विशे । विश्वेदग्निः प्रति रक्षाꣳसि सेधति ॥

यद् । वै । उ । विश्पतिः । शितः । सुप्रीतः । सु । प्रीतः मनुषः । विशे । विश्वा । इत् । अग्निः । प्रति । रक्षाँसि । सेधति ॥११४॥

Samveda - Mantra Number : 114
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 2;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 12;

Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma)

हिन्दी
Samveda Sanhita Bhasha Bhashy (Pt. Jaydev Sharma) - हिन्दी
Meaning
भा० = ( यद्वा उ ) = जब भी ( शितः ) = मन्यु और न्याय युक्त व्यवस्था के भंग होने पर तीक्ष्ण हुआ ( विश्पतिः ) = प्रजाओं का पालक, प्रभु ( मनुषोः विशे ) = मनुष्यों और प्रजाओं के निमित्त ( सुप्रतिः ) = प्रसन्न, दत्तचित्त होता है, तब ( अग्निः ) = अग्नि स्वभाव, पापों का दाहक तेजस्वी वह ( विश्वा इत् ) = सब प्रकार के ( रक्षांसि ) = राक्षसों को ( प्रति सेधति ) = दूर करता है ।

राजा प्रजा को बसाने के लिये वह प्रजा के घातक प्राणियों और आततायी पुरुषों को तीक्ष्ण स्वभाव होकर दूर करे और प्रजा पर सदा  प्रसन्न रहे ।

अध्यात्म पक्ष में – विश्पति, इन्द्रियों का राजा आत्मा जब योगादि साधनों से तीक्ष्ण होकर इस देह में स्वच्छ, निर्मल, सुप्रसन्न हो जाता है तब वह आसुरी वृत्तियों पर विजय पाता है और व्युत्थानों को दूर करता है।
 
Subject
परमेश्वर की स्तुति
Footnote
११४-'मनुष्यो विशि' इति ॠ० ।
Rishi | Devata | Chhanda | Swara
ऋषिः - विश्वमना वैयश्वः। 

छन्दः - ककुप् ।