Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 992

1875 Mantra
Devata- इन्द्राग्नी Rishi- भरद्वाजो बार्हस्पत्यः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
या꣢ वा꣣ꣳ स꣡न्ति꣢ पुरु꣣स्पृ꣡हो꣢ नि꣣यु꣡तो꣢ दा꣣शु꣡षे꣣ नरा । इ꣡न्द्रा꣢ग्नी꣣ ता꣢भि꣣रा꣡ ग꣢तम् ॥९९२॥

याः । वा꣣म् । स꣡न्ति꣢꣯ । पु꣣रुस्पृ꣡हः꣢ । पु꣣रु । स्पृ꣡हः꣢꣯ । नि꣣यु꣡तः꣢ । नि꣣ । यु꣡तः꣢꣯ । दा꣣शु꣡षे꣢ । न꣣रा । इ꣡न्द्रा꣢꣯ग्नी । इ꣡न्द्र꣢꣯ । अ꣣ग्नीइ꣡ति꣢ । ता꣡भिः꣢꣯ । आ । ग꣣तम् ॥९९२॥

Mantra without Swara
या वाꣳ सन्ति पुरुस्पृहो नियुतो दाशुषे नरा । इन्द्राग्नी ताभिरा गतम् ॥

याः । वाम् । सन्ति । पुरुस्पृहः । पुरु । स्पृहः । नियुतः । नि । युतः । दाशुषे । नरा । इन्द्राग्नी । इन्द्र । अग्नीइति । ताभिः । आ । गतम् ॥९९२॥

Samveda - Mantra Number : 992
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 3;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(नरा) जगत् के नायक ! (पुरुस्पृहा) बहुतों से चाहे हुए। (इन्द्राग्नी) सूर्य ! और अग्नि ! (याः) जो (वाम्) तुम दोनों की (नियुतः) किरणें (सन्ति) हैं (ताभिः) उनसे (दाशुषे) यजमान के लिये (आगतम्) प्राप्त होओ॥
यदि सूर्य और अग्नि न हों तो समस्त लोक जड़वत् गिर जावे, हिलना चलना बन्द हो जावे, इसलिये इनको नायक कहा गया है। इनकी किरणें जगत् के रोगादिजनित भय दूर करने से अमृत का काम देती हैं, इससे सबको इनकी चाहना होती है। ये कितनों को तो भले प्रकार मिलनी भी दुर्लभ हैं। सो यज्ञ करने वालों को सुलभ हों, यह इस मन्त्र में प्रार्थना है॥
Footnote
ऋ० ६। ६०। ८ में भी॥