Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 99

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
अ꣢ग्ने꣣ वा꣡ज꣢स्य꣣ गो꣡म꣢त꣣ ई꣡शा꣢नः सहसो यहो । अ꣣स्मे꣡ दे꣢हि जातवेदो꣣ म꣢हि꣣ श्र꣡वः꣢ ॥९९॥

अ꣡ग्ने꣢꣯ । वा꣡ज꣢꣯स्य । गो꣡म꣢꣯तः । ई꣡शा꣢꣯नः । स꣣हसः । यहो । अस्मे꣡इ꣢ति । दे꣣हि । जातवेदः । जात । वेदः । म꣡हि꣢꣯ । श्र꣡वः꣢꣯ ॥९९॥

Mantra without Swara
अग्ने वाजस्य गोमत ईशानः सहसो यहो । अस्मे देहि जातवेदो महि श्रवः ॥

अग्ने । वाजस्य । गोमतः । ईशानः । सहसः । यहो । अस्मेइति । देहि । जातवेदः । जात । वेदः । महि । श्रवः ॥९९॥

Samveda - Mantra Number : 99
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 11;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(जातवेदः) प्रकाश से बुद्धितत्त्व के फैलाने वाले ! (अग्ने) प्रसिद्ध (गोमतः, वाजस्य) गवादिधनयुक्त, अन्न का (ईशानः) स्वामी [तू है]। (महसः, यहो) बल की, सन्तान ! (अस्मे) हमारे लिये (महि) बड़ा (श्रवः) धन वा अन्न (हिः) दे॥
अग्नि से ही प्रकाश होता और प्रकाश से घट पटादि द्रव्यों पर बुद्धि तत्त्व फैलता है। इसलिए अग्नि जातवेदा है। और अग्नि में होम द्वारा जलवायु की शुद्धि, दृष्टि, धन-धान्य तृणादि की वृद्धि होकर पशु भी बढ़ते है। इसलिये अग्नि, पशुओं तथा धन धान्यादि का स्वामी है। और इसी कारणवश इन पदार्थों का दाता भी है। वह अग्नि बल की सन्तान इसलिये कहा गया है कि बल से क्रिया और क्रिया से अग्नि की उत्पत्ति है॥
Footnote
निघण्टु २। ९॥ २। २॥ २। ७॥ २। १० के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋ० १। ७६। ४ में “धेहि” इतना अन्तर है॥