Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 98

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- विश्वामित्रो गाथिनः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
प्र꣡ होत्रे꣢꣯ पू꣣र्व्यं꣢꣫ वचो꣣ऽग्न꣡ये꣢ भरता बृ꣣ह꣢त् । वि꣣पां꣡ ज्योती꣢꣯ꣳषि꣣ बि꣡भ्र꣢ते꣣ न꣢ वे꣣ध꣡से꣢ ॥९८॥

प्र꣢ । हो꣡त्रे꣢꣯ । पू꣣र्व्य꣢म् । व꣡चः꣢꣯ । अ꣣ग्न꣡ये꣢ । भ꣣रत । बृह꣢त् । वि꣣पा꣢म् । ज्यो꣡तीँ꣢꣯षि꣣ । बि꣡भ्र꣢꣯ते । न । वे꣣ध꣡से꣢ ॥९८॥

Mantra without Swara
प्र होत्रे पूर्व्यं वचोऽग्नये भरता बृहत् । विपां ज्योतीꣳषि बिभ्रते न वेधसे ॥

प्र । होत्रे । पूर्व्यम् । वचः । अग्नये । भरत । बृहत् । विपाम् । ज्योतीँषि । बिभ्रते । न । वेधसे ॥९८॥

Samveda - Mantra Number : 98
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 11;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(वेधसे, न) जगत्कर्त्ता के समान (विपां, ज्योतींषि, बिभ्रते) मेधावी लोगों में, ज्योतियों को, धारण करते हुए (होत्रे) हवनकर्त्ता (अग्नये) अग्नि के लिये (पूर्व्यम्) सनातन [वैदिक] (बृहत्) बड़ा (वचः) सूक्त (प्र, भरत) उच्चारित करो।
जिस प्रकार जगत्स्रष्टा परमात्मा तेजों का धारण करता है इसी प्रकार किसी अंश में अग्नि भी तेज का धारण करता है। और जिस प्रकार परमात्मा कर्मफल पहुँचाता है, इस प्रकार अग्नि भी हुत द्रव्यों को मेघ-मण्डलादि में पहुँचाता है। और जिस प्रकार उपासकों में [तेजोऽसि तेजो मयि धेहि० यजुः १९। ९ के अनुसार] विशेष करके परमात्मा तेज का धारण करता है, इसी प्रकार अग्नि भी मेधावी होत्रादि ऋत्विजों में विशेष तेज को धारण करता है। और साधारणतया जिस प्रकार परमात्मा चराचर में तेज को धारण करा रहा है, इसी प्रकार घटपटादि परमात्मा के वर्णन और अग्नि के वर्णन को करो। जिससे दोनों के गुणकीर्तन से दोनों लोक का सुख प्राप्त करने में सुगमता हो॥
Footnote
निघण्टु ३।१५ आदि के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये। ऋग्वेद ३।१०।५ में भी ऐसा पाठ है॥