Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 970

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- असितः काश्यपो देवलो वा Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣢रि꣣ वि꣡श्वा꣢नि꣣ चे꣡त꣢सा मृ꣣ज्य꣢से꣣ प꣡व꣢से म꣣ती꣡ । स꣡ नः꣢ सोम꣣ श्र꣡वो꣢ विदः ॥९७०॥

प꣡रि꣢꣯ । वि꣡श्वा꣢꣯नि । चे꣡त꣢꣯सा । मृ꣣ज्य꣡से꣢ । प꣡व꣢꣯से । म꣣ती꣢ । सः । नः꣣ । सोम । श्र꣡वः꣢꣯ । वि꣣दः ॥९७०॥

Mantra without Swara
परि विश्वानि चेतसा मृज्यसे पवसे मती । स नः सोम श्रवो विदः ॥

परि । विश्वानि । चेतसा । मृज्यसे । पवसे । मती । सः । नः । सोम । श्रवः । विदः ॥९७०॥

Samveda - Mantra Number : 970
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 2;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(सोम) सोम ! तू हम से (मती) बुद्धि और (चेतसा) चित्त लगा कर (मृज्यसे) शोधा जाता है (सः) वह तू (नः) हमारे लिये (श्रवः) अन्न (विदः) प्राप्त कराता और (पवसे) पवित्रता करता है॥
जो लोग जी से सोमयाग शुद्धिपूर्वक करते हैं, उन की शुद्धि होती और अन्नादि का लाभ होता है। शुद्धि बड़ी वस्तु है जिस के बिना मनुष्यों के प्राण भी बचने कठिन होते हैं॥
Footnote
ऋ० ९। २०। ३ का पाठभेद संस्कृतभाष्य में देखिये॥