Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 97

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- दीर्घतमा औचथ्यः Chhand- उष्णिक् Swara- ऋषभः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
पु꣣रु꣡ त्वा꣢ दाशि꣣वा꣡ꣳ वो꣢चे꣣ऽरि꣡र꣢ग्ने꣣ त꣡व꣢ स्वि꣣दा꣢ । तो꣣द꣡स्ये꣢व शर꣣ण꣢꣫ आ म꣣ह꣡स्य꣢ ॥९७॥

पु꣣रु꣢ । त्वा꣣ । दाशिवा꣢न् । वो꣣चे । अरिः꣢ । अ꣣ग्ने । त꣡व꣢꣯ । स्वि꣣त् । आ꣢ । तो꣣द꣡स्य꣢ । इ꣣व शरणे꣢ । आ । म꣣ह꣡स्य꣢ ॥९७॥

Mantra without Swara
पुरु त्वा दाशिवाꣳ वोचेऽरिरग्ने तव स्विदा । तोदस्येव शरण आ महस्य ॥

पुरु । त्वा । दाशिवान् । वोचे । अरिः । अग्ने । तव । स्वित् । आ । तोदस्य । इव शरणे । आ । महस्य ॥९७॥

Samveda - Mantra Number : 97
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 2; Ardh Prapathak » 1; Dashati » 1;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 11;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
पुरु त्वा० इत्यादि १० ऋचा की ११ वीं दशति है। इसका उष्णिक् छन्द है। फिर १२ वीं दशति में ८ ऋचा ककुभ् छन्द की हैं॥ १॥ जिनमें “अज्ञानः०” इत्यादि ११ वीं दर्शाति की ५ वीं ऋचा का पवमान देवता तथा उससे अगली “उतस्या०” इत्यादि ६ ठी का अदिति देवता है। शेष दोनों दशतियों की १६ ऋचाओं का अग्नि देवता है। आग्नेय काण्ड में अन्य देवता वाली ऋचा हैं तो इस पर्व का नाम आग्नेय पर्व कैसे ठीक रहा ? इस शंका का समाधान यह है कि जिस प्रकार “छत्रवाले जाते है” ऐसा कहने से उन छत्रवालों के सहचरी बिना छत्रवाले वाले भी कोई जाते हों, तब भी मुख्य ही को ध्यान में रखकर “छत्रवाले कहे जाते हैं” ऐसा कहने से बिना छत्रवालों का भी ग्रहण हो जाता है। इसी प्रकार यहां मुख्य करके अग्नि का वर्णन है उसके साथ में प्रकरण में आवश्यकता पड़ने से अन्यदेवता का वर्णन आ जाना भी इस पर्व के आग्नेयता का बाधक समझना चाहिये।
भावार्थ:— (अग्ने) परमात्मन् ! (दाशिवाङ्) भक्तिरूप भेंट देने वाला (अरिः) सेवक मैं (तव, स्वित् आ) तुम्हारे, ही (शरणे) आश्रय में (त्वा) आपकी (पुरु) बहुत (वोचे) स्तुति करता हूँ। दृष्टान्त—(महस्य) बड़े (तोदस्येव) शिक्षक के आश्रय में जैसे [शिष्य] (आ) पादपूत्यर्थं है।
जिस प्रकार शिष्य वा मृत्य लोग लोक में अपने शिक्षक गुरु वा स्वामी की आज्ञा में रहते हैं इसी प्रकार परमात्माकी आज्ञा आख्या और स्तुति में लगना चाहिये।
भौतिक पक्ष में—(अग्ने) अग्ने ! (दाशिवाङ्) हव्य देने वाला (अरिः) अग्निहोत्र सेवन करने वाला मैं (तव, स्वित्-आ) तेरे ही (शरणे) गृह अर्थात् अग्न्यागार नामक शाला (रूम) में (त्वा) तुझे (पुरु, वोचे) बहुत वर्णित करूं। जिस प्रकार (महस्य) बड़े (तोदस्येव) शिक्षक के [आश्रय में शिष्य]॥
जिस प्रकार शिक्षक के सेवन में शिष्यादि प्रवृत्त रहते हैं तभी विद्यादि प्राप्त कर सकते हैं, इसी प्रकार अग्न्यागार नामक भवन में हवन तथा मन्त्र द्वारा अग्नि का वर्णन करने वाले ही लोग सर्व रोगादि शत्रुओं से बचते और सुख-समृद्धि को पा सकते हैं॥
Footnote
अष्टाध्यायी ६।१।१२॥ निघण्टु ३। ५॥ ३। ४॥ निरुक्त ५।७ इत्यादि के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ पं० ज्वालाप्रसाद भार्गव (आगरा) ने “स्विदा” के “स्वित्, आ” इन दो पदों को “स्विदा” यह एक पद किया और परिचरणार्थज स्वद धातु से बनाया है। सो स्वद से स्विदा नहीं बनता और पदपाठ के विरुद्ध होने से भी अमान्य है।