Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 96

1875 Mantra
Devata- अग्निः Rishi- प्रस्कण्वः काण्वः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः Kaand Name- आग्नेयं काण्डम् Gaan- प्रकृति गान Gaan Parva- आग्नेयं पर्व
Mantra with Swara
त्व꣡म꣢ग्ने꣣ व꣡सू꣢ꣳरि꣣ह꣢ रु꣣द्रा꣡ꣳ आ꣢दि꣣त्या꣢ꣳ उ꣣त꣢ । य꣡जा꣢ स्वध्व꣣रं꣢꣫ जनं꣣ म꣡नु꣢जातं घृत꣣प्रु꣡ष꣢म् ॥९६॥

त्व꣢म् । अ꣣ग्ने । व꣡सू꣢꣯न् । इ꣣ह꣢ । रु꣣द्रा꣢न् । आ꣣दित्या꣢न् । आ꣣ । दित्या꣢न् । उ꣣त꣢ । य꣡ज꣢꣯ । स्व꣣ध्वर꣢म् । सु꣣ । अध्वर꣢म् । ज꣡न꣢꣯म् । म꣡नु꣢꣯जातम् । म꣡नु꣢꣯ । जा꣣तम् । घृ꣣तप्रु꣡ष꣢म् । घृ꣣त । प्रु꣡ष꣢꣯म् ॥९६॥

Mantra without Swara
त्वमग्ने वसूꣳरिह रुद्राꣳ आदित्याꣳ उत । यजा स्वध्वरं जनं मनुजातं घृतप्रुषम् ॥

त्वम् । अग्ने । वसून् । इह । रुद्रान् । आदित्यान् । आ । दित्यान् । उत । यज । स्वध्वरम् । सु । अध्वरम् । जनम् । मनुजातम् । मनु । जातम् । घृतप्रुषम् । घृत । प्रुषम् ॥९६॥

Samveda - Mantra Number : 96
(Kauthum) पूर्वार्चिकः: » Prapathak » 1; Ardh Prapathak » 2; Dashati » 5;
(Rananiya) पूर्वार्चिकः: » Adhyay » 1; Khand » 10;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(अग्ने) अग्ने ! (त्वम्) तू (वसून्) ८ वसुओं (रुद्रान्) ११ रुद्रों (उत) और (आदित्यान्) १२ आदित्यों तथा (घृतप्रुषम्) पवन और (स्वध्वरम्) प्रजापति इन ३३ देवों और (मनुजातम्) ईश्वरसृष्टिगत (जगम्) प्राणिमात्र को (इह) इस यज्ञ में (यज) अनुकूल और संगत [ठीक] कर॥
अर्थात् अग्नि में होम करने से ३३ देवगणों की अनुकूलता होती है इसलिये नित्य होम करना चाहिये॥
ईश्वर पक्ष में — (अग्ने) हे परमात्मन् ! (त्वम्) आप (इह) इस संसार में (वसून्) २४ वर्षावधि ब्रह्मचर्य के अनुष्ठानी, (रुद्रान्) ४४ वर्षावधि ब्रह्मचर्य्यानुष्ठानी (उत) और (आदित्यान्) ४८ वर्षावधि ब्रह्मचर्य्यानुष्ठानी पुरुषों तथा (स्वध्वरम्) भले प्रकार यज्ञानुष्ठानी (घृतप्रुषम्) घृतसेचक (मनुजातम्) मनुष्य और (जनम्) प्राणिमात्र को (यज) संगत कीजिये॥
Footnote
निघण्टु १।१२ इत्यादि के प्रमाण संस्कृतभाष्य में देखिये॥ ऋग्वेद ११४५।१ में भी ऐसा ही पाठ है॥
ऊपर लिखे शतपथ में इस प्रकार ३३ देवताओं के नाम बताये हैं कि ८—वसु-अग्नि—पृथ्वी वायु अन्तरिक्ष आदित्य द्यौ चन्द्र और नक्षत्र, ११ रुद्र—प्राण अपान उदान समान व्यान नाग कूर्म कृकल देवदत्त और घनञ्जय और ११वां आत्मा, १२ आदित्य वर्ष के १२ नाम, यह सब पदार्थ देवता हैं। पूर्वोक्त ८ पदार्थ वसु इसलिये हैं कि (एतेषु हीदं सर्वं वसु हितम्) इनमें ही यह सब सुवर्णादि धन रखा है (एते हीदं सर्वं वासयन्ते) ये ही सब [जगत्] को बसाते हैं [इससे यह भी सूचित है कि सूर्यादि लोकों में भी बसतियां हैं] पूर्वोक्त ११ पदार्थ रुद्र इसलिये हैं कि — (यदास्मान्मर्त्यांच्छरीरादुत्क्रामन्त्यथ रोदयन्ति तद्यद्रो०) जब मनुष्यदेह से ये प्राणादि ११ रूद्र निकलते हैं तब इष्ट मित्र सम्बन्धियों को रोदन कराते हैं, बस रोदन कराने से रुद्र का नाम पड़ा। पूर्वोक्त संवत्सर के १२ मास आदित्य इसलिये हैं कि (एते हीदंसर्वमाददाना यन्ति०) ये चैत्रादि द्वादश मास ही सब जगत् को लिये हुए जाते हैं इससे आदित्य नाम पड़ा। यह जो शतपथ ब्राह्मण के वचन का अर्थ है। विशेष यह है कि क्या सप्ताह के ७ वार; वा अहोरात्र के दो भाग दिन और रात्रि, वा शुक्लपक्ष कृष्णपक्ष ये सब भी तो जगत् को लिये हुए जाते हैं ये भी आदित्य हो सकते हैं ? नहीं, इसमें सूक्ष्म विचार है। कल्पना करो कि आज रविवार है और ७ दिन पश्चात् यही रविवार फिर आवेगा परन्तु यह ठीक आगामी रविवार के तुल्य नहीं हो सकता क्योंकि इस रविवार में ४ तिथि है आगामी में ११ तिथि होगी जैसी और जितनी चन्द्र वा सूर्यादि की ठण्ड भौर उष्णतादि आज है आगामी की ११ तिथि रविवार को न होगी क्योंकि चन्द्रकला न्यून हो जायगी, दक्षिणायन के कारण सूर्य की उष्णता घट जायेगी, इत्यादि अनेक कारणों से आज का रविवार आगामी रविवारों की अपेक्षा बहुत ही भेद रखता है। इसी प्रकार आज के दिन और रात्रि के सदृश आगामी दिन रात्रि भी सूर्यादि की उष्णता आदि के भेद से कभी नहीं हो सकते हैं। तथा यही भेद वर्त्तमान शुक्ल कृष्ण पक्ष के सहश आगागी शुक्लपक्ष कृष्णपक्ष की तुल्यता में भी बाधक है। इस लिये चैत्रादि १२ मास ही पुनः पुनः लौटकर अधिकांश में तुल्यावस्था से आते हैं। जैसे—सास्मिन्पौर्णमासीति। अष्टाध्यायी ४।२।२० इस सूत्र के अनुसार चित्रा नक्षत्रयुक्त पौर्णमासी जिस मास की वह चैत्र, विशाखानक्षत्रयुक्त पौर्णमासी जिस मास की वह वैशाख, इसी प्रकार ज्येष्ठ न०—ज्येष्ठ, आषाढा नक्ष० आषाढ, श्रवण न० — श्रावण, भाद्रपदा, न० भाद्रपद, अश्विनी०—आश्विन, कृत्तिका०–कार्तिक, मृगशिर० मार्गशिर, पुष्य न० पौष, मघा०— माघ और फल्गुनी०—फाल्गुन॥
बस, जिस नक्षत्र से युक्त जिस मास की पौर्णमासी इस वर्ष है प्रायः उसी नक्षत्र के लगभग सहस्रों वर्ष से उस-उस मास की पौर्णमासी होती रही हैं। और सौर मास की रीति से संक्रान्तिमास १२—मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ और मीन ये १२ संक्रान्ति भी इस वर्ष के समान सब वर्षों में हुईं और होंगी। इस कारण १ वर्ष के १२ सौर वा चान्द्र मास ही आदित्य हो सकते हैं, अन्य कालविभाग नहीं॥
इस प्रकार शाकल्य ऋषि से याज्ञवल्क्य जी कहते हैं कि ३३ देवता कौन-से है। ८ वसु ११ रुद्र १२ आदित्य ये ३१ हुए। इन्द्र और प्रजापति ये मिलकर ३३ हुए। इन्द्र किसे कहते हैं ? स्तनयित्नु अर्थात् बिजुली को। प्रजापति कौन-सा है ? यज्ञ प्रजापति है। प्रजापति क्या है ? पशु ही प्रजापति हैं क्योंकि प्रजा का पालन इन्हीं से होता है।