Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 958

1875 Mantra
Devata- पवमानः सोमः Rishi- कश्यपो मारीचः Chhand- गायत्री Swara- षड्जः
Mantra with Swara
प꣡व꣢मानस्य विश्ववि꣣त्प्र꣢ ते꣣ स꣡र्गा꣢ असृक्षत । सू꣡र्य꣢स्येव꣣ न꣢ र꣣श्म꣡यः꣢ ॥९५८॥

प꣡वमा꣢꣯नस्य । वि꣣श्ववित् । विश्व । वित् । प्र꣢ । ते꣣ । स꣡र्गाः꣢꣯ । अ꣣सृक्षत । सू꣡र्य꣢꣯स्य । इ꣣व । न꣢ । र꣣श्म꣡यः꣢ ॥९५८॥

Mantra without Swara
पवमानस्य विश्ववित्प्र ते सर्गा असृक्षत । सूर्यस्येव न रश्मयः ॥

पवमानस्य । विश्ववित् । विश्व । वित् । प्र । ते । सर्गाः । असृक्षत । सूर्यस्य । इव । न । रश्मयः ॥९५८॥

Samveda - Mantra Number : 958
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 2;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 6; Khand » 1;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
(विश्ववित्) हे सर्वज्ञेश्वर ! (पवमानस्य) पवित्र करते हुए (ते) आपकी (सर्गाः) वैदिक ऋचा रूपिणी धारायें (प्राऽसृक्षत) ऐसे छूटती हैं (न) जैसे (सूर्यस्येव रश्मयः) सूर्य की किरणें॥
जैसे सूर्य की किरणें उदय होकर मनुष्यादि प्राणियों की आंखों में सहायता देती हैं, वैसे ही परमात्मा से वेद प्रकट होकर मनुष्यों की बुद्धियों को सन्मार्ग में प्रवृत्त करते हैं॥
Footnote
ऋ० ९। ६४। ७ में भी॥