Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

Samveda Mantra 951

1875 Mantra
Devata- इन्द्रः Rishi- गोतमो राहूगणः Chhand- अनुष्टुप् Swara- गान्धारः
Mantra with Swara
इ꣡न्द्रा꣢य नू꣣न꣡म꣢र्चतो꣣क्था꣡नि꣢ च ब्रवीतन । सु꣣ता꣡ अ꣢मत्सु꣣रि꣡न्द꣢वो꣣ ज्ये꣡ष्ठं꣢ नमस्यता꣣ स꣡हः꣢ ॥९५१॥

इ꣡न्द्रा꣢꣯य । नू꣣न꣢म् । अ꣣र्चत । उक्था꣡नि꣢ । च꣣ । ब्रवीतन । ब्रवीत । न । सुताः꣡ । अ꣡मत्सुः । इ꣡न्द꣢꣯वः । ज्ये꣡ष्ठ꣢꣯म् । न꣣मस्यत । स꣡हः꣢꣯ ॥९५१॥

Mantra without Swara
इन्द्राय नूनमर्चतोक्थानि च ब्रवीतन । सुता अमत्सुरिन्दवो ज्येष्ठं नमस्यता सहः ॥

इन्द्राय । नूनम् । अर्चत । उक्थानि । च । ब्रवीतन । ब्रवीत । न । सुताः । अमत्सुः । इन्दवः । ज्येष्ठम् । नमस्यत । सहः ॥९५१॥

Samveda - Mantra Number : 951
(Kauthum) उत्तरार्चिकः: » Prapathak » 3; Ardh Prapathak » 1;
(Rananiya) उत्तरार्चिकः: » Adhyay » 5; Khand » 6;

Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami)

हिन्दी
Samveda Bhashyam (Tulsiram Swami) - हिन्दी
Meaning
हे प्रजाजनो ! (इन्द्राय) राजा के लिये (नूनम्) अवश्य (अर्चत) सत्कार करो (उक्थानि) उसकी स्तुतियें (ब्रवीतन) उच्चारण करो (सुताः) अभिषुत (इन्दवः) सोम (अमत्सुः) उसे हृष्ट करें (सहः) बलवान् (ज्येष्ठन्) बड़े राजा को (नमस्यत) नमस्कार करो॥ ऋ० १। ८४। करो॥ ऋ० १। ८४। ५ में भी॥ ३॥
भावार्थ “अब चतुर्थ दिन में षोडशी (याग) होता है। उस षोडशी का बड़ा विचार है। (इन्द्रश्च) यहां से आरम्भ करके निदानकृत ने बड़ा विचार किया है। ३४ अक्षर ‘स्तुत’ कहाते हैं। तदनुसार ‘प्रवह’ इत्यादि उपसर्गाक्षर निरूपित किये हैं। इस प्रकार प्रत्येक ऋचा के पहिले ३ तीन पादों में पादान्त के उपसर्गाक्षर होते हैं। यह विवरणकार का मत है। तथा च—
१— ऋचा में — प्र व ह, ह रि ह, म ति र्न—ये ९। २—में न व्यं न, दि वो न, स्व ३ र्न—ये ९। और ३ में—मि त्रो न य ति र्न, भु गु र्न—ये ९ तथा प्रथम ऋचा के चतुर्थ पाद के आरम्भ में—न धो ३ श्च का न—ये ७ सब मिलकर ३४ उपसर्गाक्षर हुए। इसमें—स्व ३ र्न, मधो ३:— इन दोनों में ३ मात्रा के प्लुत को दो अक्षर गिनकर बड़े विचार (क्लिष्ट कल्पना) से ३४ की गिनती पूरी होती है।
Footnote
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